दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो.

Saturday, December 27, 2008

भिक्षाम देही

साईं बाबा अपने भक्तों के घर जाकर आवाज लगाते थे - भिक्षाम देही. भक्त बाहर आते और जो कुछ घर में होता बाबा के अर्पण करते. बाबा अपनी झोली का मुंह खोल देते, भिक्षा झोली में आ जाती, और साथ ही झोली में आ जाते भक्तों के दुःख और कष्ट. 

एक बार कुछ लोगों के चढाने पर आयकर अधिकारी बाबा कि संपत्ति का लखा-जोखा करने आए. शिकायत थी कि बाबा के पास अगाध धन है पर वह एक पैसा भी आयकर नहीं देते. बाबा आयकर अधिकारी के रहने की जगह पहुँच गए भिक्षा मांगने, पर उस ने कुछ नहीं दिया. कुछ समय पश्चात् आयकर अधिकारी को सत्य का ज्ञान हुआ. बाबा फ़िर आ गए भिक्षा मांगने. इस बार आयकर अधिकारी ने उन्हें भिक्षा दी और भिक्षा के साथ आयकर अधिकारी  का पेट का दर्द भी झोली में आ गया. 

ऐसे थे साईं बाबा. सब का मालिक एक है. 

Thursday, December 25, 2008

Sunday, December 14, 2008

तुम अपनी पूजा करो

लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार पूजा करते हैं. सब के पूजा करने के अपने अलग तरीके हैं. सबका अपना विश्वास है कि इस तरह पूजा कर के वह अपने भगवान् को पा सकेंगे. 

सब अपनी आस्था के अनुसार पूजा करें, और दूसरों को उनकी आस्था के अनुसार पूजा करने दें. किसी और की पूजा पद्धति से किसी दूसरे को तकलीफ क्यों हो? 

कुछ लोग मूर्ति पूजा करते हैं, कुछ नहीं. जो मूर्ति पूजा करते हैं उन्हें कोई तकलीफ नहीं कि दूसरे पूजा कैसे करते हैं. लेकिन कुछ लोग, जो मूर्ति पूजा नहीं करते, परेशान रहते हैं कि कुछ लोग मूर्ति पूजा क्यों करते हैं. यह लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते, इस में कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन जब यह लोग मूर्ति पूजा का विरोध करने लगते हैं तब समस्या पैदा हो जाती है. मूर्ति पूजा न करने वालों को इस ग़लत बात से बचना चाहिए. 

तुम अपनी पूजा करो, दूसरों को उन की पूजा करने दो. सब का मालिक एक है. 

Wednesday, December 10, 2008

भगवान की प्राप्ति कैसे हो?

अक्सर लोग ऐसा कहते हैं कि भगवान की दया तो सभी पर समान भावः से है, फ़िर सबको भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती? 

इस में कोई संशय नहीं कि भगवान की पूर्ण दया सभी पर समान भाव से है. किंतु जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति अपने घर में गढ़े हुए धन को न जानने के कारण तथा पास में पड़े हुए पारस को न जानने के कारण लाभ नहीं उठा सकता, बैसे ही अज्ञानी लोग भगवान को और भगवान की दया के रहस्य को न जानने से भगवान प्राप्ति का लाभ नहीं उठा सकते. भगवान की दया के रहस्य को समझने से शोक और भय का अत्यन्त अभाव हो जाता है, सदा के लिए परम शान्ति एवं परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है. भीष्म, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि भगवान की दया के रहस्य को जानते थे, इसलिए वह कृतकृत्य हो गए, किन्त अज्ञान के कारण दुर्योधन आदि न हो सके. 

भगवान और भगवान की दया के रहस्य को जानने का सबसे सरल उपाय है - भगवान् की अनन्य शरण हो जाना:
१. भगवान के किए प्रत्येक विधान में प्रसन्नचित्त रहना, 
२. निष्काम प्रेम-भाव से नित्य-निरंतर उस के स्वरुप का चिंतन करते हुए उसके नाम का जप करना एवं उसकी आज्ञा का पालन करना,
३. जो व्यक्ति भगवान के प्रभाव एवं तत्व को जानने वाले हैं तथा जो भगवान् की अनन्य शरण हो चुके हैं, ऐसे प्रेमी भक्तों का संग करके, उनके बतलाये हुए मार्ग के अनुसार चलना.

गीता में भगवान ने स्वयं अर्जुन से कहा है - "हे अर्जुन, जो मनुष्य केवल मेरे लिए, सब कुछ मेरा समझता हुआ, यज्ञ, दान और तप आदि सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है और मेरे परायण है, अर्थात मेरे को परम आश्रय और परमगति मान कर, मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर है तथा मेरा भक्त है अर्थात मेरे नाम, गुण, प्रभाव और रहस्य के श्रवण, कीर्तन, मनन, ध्यान और पठन-पाठन का प्रेम सहित, निष्काम भावः से निरंतर अभ्यास करने वाला है और आसक्ति रहित है अर्थात स्त्री, पुरूष और धन आदि सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थों में स्नेह रहित है और सम्पूर्ण भूत प्राणियों में  वैरभाव से रहित है, ऐसा वह अनन्य भक्ति वाला मनुष्य मेरे को ही प्राप्त होता है." 

Tuesday, December 09, 2008

सब मुस्लिम भाई-बहनों को हेप्पी ईद-उल-जुहा

ईद-उल-जुहा इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है । यह त्यौहार पैगम्बर इब्राहीम द्वारा दिखाई गई बलिदान की भावना का त्यौहार है. यह इंसान के मन में ईश्वर के प्रति विश्वास की भावना को बढ़ाता है. परस्पर प्रेम, सहयोग और ग़रीबों की सेवा करने का आनंद इस त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ है. 

भारत और भारत से बाहर रहने वाले मुस्लिम भाई और बहनों को मेरी और से हेप्पी ईद-उल-जुहा. 

Saturday, December 06, 2008

कबीरा कहिन

कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय ।
रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास ।
जो है जाको भावता, सो ताही के पास ॥

प्रीतम के पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस ।
तन में मन में नैन में, ताको कहा सँदेस ॥

नैनन की करि कोठरी, पुतली पलँग बिछाय ।
पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय ॥

भक्ति भाव भादों नदी, सबै चलीं घहराय ।
सरिता सोइ सराहिये, जो जेठ मास ठहराय ॥

लागी लागी क्या करै, लागी बुरी बलाय ।
लागी सोई जानिये, जो वार पार ह्वै जाय ॥

जाको राखे साइयाँ, मारि न सक्कै कोय ।
बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय ॥

नैनों अंतर आव तूँ, नैन झाँपि तोहिं लेवँ ।
ना मैं देखी और को, ना तोहि देखन देवँ ॥

सब आए उस एक में, डार पात फल फूल ।
अब कहो पाछे क्या रहा, गहि पकड़ा जब मूल ।।

लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल ।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़ै बन माहिं ।
ऐसे घट में पीव है, दुनिया जानै नाहिं ॥

सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय ।
जैसे बाती दीप की, कटि उजियारा होय ॥

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥

बिरहिनि ओदी लाकड़ी, सपचे और धुँधुआय ।
छुटि पड़ौं या बिरह से, जो सिगरी जरि जाय ॥

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं ॥

इस तन का दीवा करौं, बाती मेलूँ जीव ।
लोही सींचीं तेल ज्यूँ, कब मुख देखीं पीव ॥

हेरत-हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ ।
बूँद समानी समँद में, सो कत हेरी जाइ ॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरज से सब होय ।
माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ॥

दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।
बिना जीव की स्वाँस से, लोह भसम ह्वै जाय ॥

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय ।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥

जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल ।
तोकि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल ॥

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥

माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदै मोहिं ।
इक दिन ऐसा होइगा, मैं रौंदोंगी तोहिं ॥

माली आवत देखिकै, कलियाँ करीं पुकार ।
फूली-फूली चुनि लईं, कालि हमारी बार ॥

Thursday, December 04, 2008

आवाज दो हम एक हैं

मुंबई में हिंदू मरे, मुसलमान मरे, यहूदी मरे, गरीब मरे, अमीर मरे, आम आदमी मरे, खास आदमी मरे, बच्चे मरे, बड़े मरे, औरतें मरीं, सुरक्षा कर्मी मरे. गोली ने यह नहीं पूछा कि तुम किस धर्म के हो, समाज के किस वर्ग के हो, बस लगी और जिंदगी ख़त्म. 

जब जिन्दा थे तो भेद-भाव करते थे. अब मौत ने सबको एक कर दिया. आओ इस से सबक लें. जिंदगी में भी एक हो जाएँ. मिटा दें सारे भेद-भाव. सबसे प्रेम करें. एक-दूसरे का दर्द महसूस करें. एक जुट होकर आतंकवाद का मुकाबला  करें. 

Saturday, November 29, 2008

मिल जुल कर नहीं रह सकते, क्यों, आख़िर क्यों???

सारे धर्म प्रेम का संदश देते हैं. हर धर्म कहता है, प्यार से मिल जुल कर रहो. मगर न जाने क्यों, लोग धर्म में अलगाव ढूँढ लेते हैं? अपने-अपने खोलों में बंद हो जाते हैं. एक दूसरे से नफरत करने लगते हैं.  दूसरों की हर बात में उन्हें केवल बुराई ही नजर आने लगती है. दूसरों की जान लेना अपनी जिंदगी का मकसद बना लेते हैं. 

कैसा होगा वह आदमी जो रेल प्लेट्फार्म पर, होटल में खाना खाते इंसानों पर, बाजार में गोलियों की बोछार कर देता है? बच्चों और औरतों पर भी जिसे रहम नहीं आता. कितनी नफरत भरी होगी उस के दिल में, और वह भी उन लोगों के लिए, जिन्हें वह जानता नहीं,  जानना क्या पहचानता तक नहीं. जो यह भी नहीं जानता कि उस की गोली से कौन मरा. किस के लिए कर रहा है वह यह सब - अपने लिए, किसी दूसरे के लिए? 

क्या मिलेगा उसे यह सब करके? जन्नत में जायेगा? हूरें मिलेंगी? अरे बेबकूफों, जो यहाँ मिला है उसे छोड़कर उस के लिए मार और मर रहे हो जिसका कुछ भरोसा नहीं कि मिलेगा भी या नहीं. 

Wednesday, November 26, 2008

धर्म और राजनीति

महात्मा गाँधी ने कहा था, 'मेरे लिए धर्म से अलग कोई राजनीति नहीं है. मेरा धर्म सार्वभौम और सहनशील धर्म है, अंधविशवासों और ढकोसलों का धर्म नहीं. वह धर्म भी नहीं, जो घृणा कराता है और लड़ाता है. नैतिकता से बिलग राजनीति को त्याग देना चाहिए.' उनका यह विचार आज भी प्रासंगिक है, पर उनके नाम का इस्तेमाल करके सत्ता-सुख भोगने वालों ने इसे बहुत पहले त्याग दिया था. आज उनकी राजनीति अनैतिकता से भरपूर है. 

गाँधी जी यह भी कहा - 'धर्म का अर्थ कट्टरपंथ से नहीं है. उसका अर्थ है विश्व की एक नैतिक सुव्यवस्था में श्रद्धा. वह अदृष्ट है इसलिए उसकी वास्तविकता कम नहीं हो जाती. यह हिंदू धर्म, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म आदि सबसे परे है. यह उन धर्मों का उच्छेद नहीं, समन्वय करता है और उन्हें वास्तविक धर्म बनाता है.'

आचार्य तुलसी ने भी एक बार कहा था, 'धर्म को पहला स्थान और सम्प्रदाय को दूसरा स्थान दिया जाय तभी धर्म, समाज और राज्य के लिए प्रकाश-पुंज बन सकता है.' उनके अनुसार धर्म और सम्प्रदाय एक नहीं हैं. सम्प्रदाय धर्म की व्याख्या अथवा संप्रेषण की गुरु-परम्परा है. 

वर्तमान में सत्य, अहिंसा तथा नैतिकता वाला धर्म किसी अज्ञात कौने में छिपा बैठा है और सांप्रदायिक अभिनिवेश वाला धर्म उजागर हो रहा है. इस अवस्था में तथाकथित धर्म और राजनीति के बिलगाव की आवश्यकता चिन्तनशील तटस्थ व्यक्ति को महसूस होती है और होनी चाहिए. धर्म और राजनीति में बिलगाव की आवश्यकता के प्रश्न को सापेक्षद्रष्टि से देखना होगा. सांप्रदायिक कट्टरता और धर्म को हम एक ही आँख से देखें तो राजनीति और धर्म के अलगाव की आवश्यकता लोकतंत्र का प्रथम उच्छ्वास है. यदि धर्म को हम सत्य और अहिंसा तथा  नैतिकता की आँख से देखें तो राजनीति धर्म से शून्य होकर खतरे की घंटी से अधिक नहीं हो सकती. 

(लोकतंत्र - नया व्यक्ति नया समाज से साभार)  
    

Monday, November 24, 2008

मनुष्य की पहचान

मनुष्य अपने कर्मों से जाना जाता है, धर्म, जाति, भाषा या खान-पान से नहीं. 
यह जन्म पिछले जन्मों में किए गए कर्मों का फल है, यह फल भोगना ही होगा, इस से कोई छुटकारा नहीं है. 
ईश्वर केवल प्रेम का सम्बन्ध मानते हैं, जाति, धर्म, रंग, भाषा कुछ नहीं,
हम सब मनुष्य रूप मैं जन्में हैं, मनुष्य बन कर रहें.

Saturday, November 22, 2008

सत्संग और अंतःकरण की शुद्धता

अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - इन चारों के अंतर्गत मनुष्य की सब इच्छाएं आ जाती हैं. अर्थ और काम की प्राप्ति में 'प्रारब्ध' की आवश्यकता है. धर्म और मोक्ष की प्राप्ति में 'पुरुषार्थ' की आवश्यकता है. 

सत्संग से अंतःकरण शुद्ध होता है और स्वभाव ठीक बनता है. शास्त्र पढ़ने से मनुष्य बहुत बातें जान जाएगा, पर स्वभाव नहीं सुधरेगा. स्वभाव सुधरेगा परमात्मप्राप्ति का उद्देश्य होने से. रावण बहुत विद्द्वान था, कई विद्याओं का  जानकार था, पर उस का स्वभाव राक्षसी था. वेदों पर भाष्य लिखने पर भी उस का स्वभाव सुधरा नहीं. कारण कि उसका उद्देश्य भोग और संग्रह था, परमात्मप्राप्ति नहीं. जैसा स्वभाव होता है, बैसा ही काम करने की प्रेरणा होती है.

सत्संग, सच्छास्त्र और सद्विचार से बहुत लाभ होता है. इन में सत्संग मुख्य है. सत्संग से बड़ा लाभ होता है. शास्त्रों में, संतवाणी में सत्संग और नामजप की बड़ी महिमा आती है. दोनों में सत्संग से बहुत जल्दी लाभ होता है. पुस्तकें पढ़ने से उतना बोध नहीं होता, जितना सत्संग से होता है. 

('ज्ञान के दीप जले' से साभार)  

Wednesday, November 19, 2008

समता ही परमात्मा है, सुखी जीवन का सार है

गीता में श्री क्रष्ण ने कहा है - जिनका मन समत्वभाव में स्थित है उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, अर्थात वे जीते हुए ही संसार से मुक्त हैं; क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं. 

श्री क्रष्ण कहते हैं - जो पुरूष सुह्रद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बन्धुगणों  में, धर्मात्माओं और पापियों में भी समान भावः वाला है, वह अति श्रेष्ठ है. 

समता साक्षात् अमृत है, विषमता ही विष है. जहाँ समता है वहां सर्वोच्च न्याय है; न्याय ही सत्य है और सत्य परमात्मा का स्वरुप है. जहाँ परमात्मा है, वहां नास्तिकता, अधर्म-भावना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, असत्य, कपट, हिंसा आदि के लिए गुंजाइश ही नहीं है. अतएव जहाँ यह समता है, वहां सम्पूर्ण अनर्थों का अत्यन्त अभाव हो कर संपूर्म सद्गुणों का विकास आप ही हो जाता है. क्योंकि अनुकूलता-प्रतिकूलता से ही राग-द्वैशादी सब दोषों और दुराचारों की उत्पत्ति होती है और समता में इन का अत्यन्त अभाव है, इसलिए वहां किसी प्रकार के दोष और दुराचार के लिए स्थान ही नहीं है. 

सर्वत्र सम्द्रष्टि रखिये. यही सुखी जीवन का सार है. 

Tuesday, November 18, 2008

ऐसा राजा नरकवासी होगा

जासु राज्य प्रिय प्रजा दुखारी I
सो नृप अवसि नरक अधिकारी II

प्रजातंत्र में सर्वहितकारी समाज के लिए यह एक आदर्श-वाक्य है. जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी होती है वह राजा म्रत्युपरन्त नरक में वास करता है. भारत में प्रजातंत्र है पर किताबों में. तंत्र का प्रयोग राज्य द्वारा जिस तरह हो रहा है, सर्वहितकारी समाज की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती. प्रजा दुखी है,पर राजा अपनी सत्ता की ही चिंता करता रहता है. समय-समय पर मिथ्या भाषण करके प्रजा के दुखों को नकारने का प्रयास करना ही उस का एक कर्तव्य रह गया है. 

मानस की यह पंक्तियाँ अगर सही हैं तब इस राजा का नरकवास तय है.  

Saturday, November 15, 2008

निराकार-साकार ब्रह्म

सगुनहिं अगुनहिं नहीं कछु भेदा I
गावहिं मुनी पुरान बुध बेदा II
अगुन अरूप अलख अज होई I
भगत प्रेम रस सगुन सो होई II
जो गुन रहित सगुन सोई कैसे I
जल हिम-उपल बिलग नहीं जैसे II

वेद, पुरान, मुनि और बुध, सबका एक ही मत है कि अगुण और सगुण में कोई भेद नहीं है. जो ब्रह्म अगुण, अरूप, अद्रश्य और अजन्मा है, वही भक्त के प्रेम के कारण सगुण स्वरुप ग्रहण कर लेता है. जैसे जल, बर्फ और ओले की आकृति में भेद दिखाई देने पर भी तीनों वास्तव में एक ही हैं, उसी तरह अगुण और सगुण भी एक ही है. 

ह्रदय में निर्गुण-निराकार का निवास होता है और नेत्र में सगुण-साकार भगवान् बिराजते हैं. ब्रह्म यदि निर्गुण-निराकार होगा तो वह सम होगा. पाप-पुन्य के प्रति भी वह उदासीन होगा. दुष्टों के प्रति न तो उस में रोष होगा, और न वह सज्जनों के प्रति रागान्वित ही होगा. विश्व को संरक्षण प्रदान करने के लिए यह ब्रह्म उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता है. भक्त इस लिए प्रार्थना करता है और यह ब्रह्म निर्गुण से सगुण बन जाता है. यह ईश्वर सम नहीं हो सकता. सगुण राम स्पष्ट कहते हैं, 'मुझे सभी लोग सम कहते हैं, पर सत्य यह है कि मुझे भक्त प्रिय हैं. विशेष रूप से अनन्याश्रित भक्त तो मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं. 

(मानस मुक्तावली से साभार)

Wednesday, November 12, 2008

कार्तिक पूर्णिमा


कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है । इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।

वैष्णव मत में इस कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है क्योंकि इस दिन ही भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था। इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो "पद्मक योग" बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। अन्न, धन एव वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है इस दिन जो भी आप दान करते हैं उसका आपको कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि आप जो कुछ आज दान करते हैं वह आपके लिए स्वर्ग में सरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में आपको प्राप्त होता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।

कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था। सिख सम्प्रदाय को मानने वाले सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सौगंध लेते हैं। इसे गुरु पर्व भी कहते हैं।

Tuesday, November 11, 2008

वंदे मातरम्, विडियो क्लिप 'आनंद मठ' से

बहुत पहले 'आनंद मठ' देखी थी. आज यूट्यूब पर उसकी एक क्लिप मिली. आनंद आ गया. आप भी देखिये. 


Monday, November 10, 2008

मन्दिर








मेरी एक क्लाइंट कंपनी में उन्होंने एक मन्दिर बनाया हुआ है. सुबह सब कर्मचारी काम शुरू करने से पहले मन्दिर में पूजा करते हैं. यह तस्वीरें मैंने एकादशी के दिन खींची थी. 


Sunday, November 09, 2008

हिंसा

क्या हिंसा से कोई समस्या हल हो सकती है? मेरे विचार में तो नहीं, बल्कि हिंसा समस्या को और बढ़ा देगी. आप क्या सोचते हैं? 

Friday, November 07, 2008

प्रेम और नफरत में आप किसे चुनेंगे?

मान लीजिये आप के सामने एक ऐसी परिस्थिति आ जाती है जहाँ आप को प्रेम या नफरत में एक को चुनना है. आप किसे चुनेंगे? 

Thursday, November 06, 2008

हिंसा और भारतीय समाज

हिंसा भारतीय समाज को खोखला कर रही है. यह एक गहन चिंता का विषय है. 

हिंसा तीन प्रकार की होती है - मानसिक, बैचारिक और कर्म हिंसा. यह १० + २ + ३ पाठ्यक्रम जैसी है. १० पास तो आपको हर जगह मिल जायेंगे. १० + २ पास की संख्या भी बढ़ती जा रही है. अखबार, मीडिया हिंसक बिचारों से भरे नजर आते हैं. १० + २ + ३ भी अपनी मौजूदगी तेजी से दर्ज करा रहे हैं. जरा सी बात पर लोग कर्म हिंसा पर उतर आते हैं. बर्दाश्त करना तो जैसे लोग भूल गए हैं. 

अगर इस हिंसा को रोका न गया तो समाज टूट कर बिखर जायेगा. इसे रोकने का एक ही उपाय है, परस्पर प्रेम और आदर. मेरे भाई और बहनों, ख़ुद को और समाज को हिंसा से बचाओ. प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. 

Wednesday, November 05, 2008

मेरे पापा सबसे अच्छे हैं

कुछ दिन पहले एक विज्ञापन आता था टीवी पर - मेरे पापा सबसे अच्छे हैं. बच्चे के मुंह से सुन कर यह अच्छा लगता था. पर जब बड़े यह कहते हैं कि मेरा अल्लाह या मेरा खुदा तुम्हारे ईश्वर से अच्छा है तब कुछ अजीब लगता है. उस बच्चे ने तो अपने पिता को देखा था, उन से बातें की थीं, उनके साथ रहा था. पर इन लोगों ने तो अल्लाह को देखा है और न खुदा को और न ही ईश्वर को. यह लोग ऐसा कैसे कह देते हैं? टीवी पर फ़िर से एक विज्ञापन आना चाहिए - सब के पापा अच्छे हैं. शायद उसे देख कर यह लोग कहने लगें कि अल्लाह, खुदा और ईश्वर सब अच्छे हैं, एक समान अच्छे हैं.

Tuesday, November 04, 2008

प्रतियोगिता

आज कल हिन्दी ब्लाग जगत में,
एक प्रतियोगिता चल रही है, 
प्रेम और नफरत में,
देखें कौन जीतता है?  

Monday, November 03, 2008

कैसे बनाये जाते हैं आतंकवादी?

आतंकवादी पैदा नहीं होते, बनाये जाते हैं. पर कैसे बनाये जाते हैं यह आतंकवादी, और कौन बनाता है इन्हे आतंकवादी? कुछ दिन पहले मैंने अपने ब्लाग 'काव्य कुञ्ज' पर एक पोस्ट डाली थी - "क्या आमिर अली आतंकवादी है?" इस पोस्ट का लिंक है - http://kavya-kunj.blogspot.com/2008/10/blog-post_27.html

मैंने इस पोस्ट में आमिर के बारे में बताया था कि कैसे उसे आतंकवादी बनाने का षड़यंत्र किया गया, वह बेचारा इस षड़यंत्र का शिकार भी हो गया था, पर आख़िर वक्त पर वह जाग गया और शहीद हो गया. आप को अजीब लगेगा यह पढ़ कर कि एक आतंकवादी और शहीद हो गया. पर हकीकत यही है. मीडिया ने उसे आतंकवादी कहा, उसे मानव बम का नाम दिया, पर वह आतंकवादी नहीं था. वह तो एक इंसान था जो दूसरे इंसानों की जिंदगी बचाने के लिए शहीद हो गया. आमिर मेरा हीरो है. आप उसके बारे में जानेंगे तो आप भी उसे अपना हीरो मानेंगे. 

एक बन्दर है, मदारी जिस में चाबी भर देता है बन्दर ताली बजा-बजा कर नाचता है. थक जाता है तो उसके सर पर चपत मारा जाता है और वह बन्दर फ़िर नाचने लगता  है. जब तमाशा ख़त्म हो जाता है तो बन्दर को धक्का मार कर गिरा दिया जाता है. तमाशा ख़त्म, बन्दर ख़त्म. बस ऐसे बनते हैं आतंकवादी. 

एक उदाहरण लें. एक बस्ती में एक बिल्डिंग है, टूटी, खस्ता हाल, न जाने कितने लोग रहते हैं उस में. संडास इतना गन्दा कि कुछ देर रहना पड़े तो उलटी हो जाए. इस प्रष्टभूमि पर आतंकवादी पैदा किए जायेंगे. सीधे-सादे इंसानों को यह सब दिखाया जायेगा, उन्हें कौम के नाम पर भड़काया जायेगा, कौम के लिए उन्हें उनका कर्तव्य याद दिलाया जायेगा. कौन करता है यह सब, वह लोग जिन्होनें ख़ुद कौम के लिए कभी कुछ नहीं किया. उन्होंने संडास को कभी साफ़ नहीं कराया. बल्कि उसे और गन्दा रखा गया. दुनिया भर से कौम के नाम पर पैसा इकठ्ठा किया गया. इस पैसे से न जाने कितने संडास साफ़ किए जा सकते थे, पर इस पैसे से बारूद ख़रीदा गया और बस में विस्फोट करा कर सैकड़ों निर्दोष इंसानों की जान ले ली गई. एक सीधे-सादे इंसान को कौम के नाम पर आतंकवादी बना दिया गया, उस के हाथ में बम थमा दिया गया. मरने वालों में उन की कौम के लोग भी थे. संडास और गन्दा हो गया. न जाने और कितने आतंकवादी पैदा करेगा यह संडास. 

कौम के बहुत से लोग गन्दी, अँधेरी बस्तियों में रहते हैं. पर इन बस्तियों को सुधारने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है. क्या कौम में सब गरीब है? नहीं, कौम में पैसे वाले भी खूब हैं. और फ़िर मजहब भी यह कहता है कि अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा ग़रीबों की मदद के लिए दो. क्या यह पैसे वाले इन ग़रीबों की गन्दी बस्तियों को रहने लायक नहीं बना सकते. नहीं, वह यह नहीं करेंगे. वह तो बस इन की हर बेचारगी और परेशानी के लिए दूसरों को दोष देंगे. मजहब के नाम पर उन के दिलों में दूसरों के लिए नफरत पैदा करेंगे. उन्हें डरायेंगे, उन्हें कहेंगे कि दरवाजों के पीछे छिपे रहो वरना दूसरे मजहब वाले तुम्हें मार डालेंगे. फ़िर दूसरों को दोष देंगे कि हमें राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल नहीं होने दिया जाता. जब कोई समझदार कौम वाला एक अच्छी जिंदगी जीने लगेगा तो यह उसे मजबूर करेंगे की वह कौम के दुश्मनों से बदला ले. उस पर दवाब डालने के लिए उस के घर वालों को अगवा तक कर लेंगे. 

एक सफल डाक्टर, १.५ लाख हर महीने कमाने वाला इंजीनियर आतंकवादी बना दिया जायेगा. यह कौम की कैसी सेवा है? 

कौन हैं इन के आका? किस से लेते हैं यह आदेश? जो मजहब इंसानी मोहब्बत की सीख देता है उस के नाम पर नफरत और मौत बांटने को कौन कहता है इन से? इन के आका सरहद के इधर हैं या उधर? क्यों नहीं समझते यह लोग कि यह इन का मुल्क है, इन्हें यहीं रहना है, क्या सारी जिंदगी इसी तरह ख़ुद खौफ में रहना है और दूसरों के लिए खौफ पैदा करते रहना है? यह बात क्यों नहीं समझते यह लोग कि सरहद पार वाले अपना उल्लू सिद्ध कर रहे हैं. उन्हें इन से कोई हमदर्दी नहीं है. वह तो बस इन का इस्तेमाल कर रहे हैं. 

मेरे देशवासियों, प्रेम से रहो, शान्ति से रहो. एक दूसरे का दुःख-दर्द समझो. प्रेम ईश्वर-अल्लाह का वरदान है, इसे नफरत में बदल कर शाप मत बनाओ.

Sunday, November 02, 2008

गीता क्या कहती है?

गीता वेदों और उपनिषदों का सार है. सारांश में गीता कहती है:

    * खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। इसीलिए, जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। "
    * क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।
    * जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
    * तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर अाए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
    * खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
    * परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
    * न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा  स्थिर है - फिर तुम क्या हो?
    * तुम अपने आप को भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
    * जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द  अनुभव करेगा।

Saturday, November 01, 2008

कुरान क्या कहती है?

प्रेम और नफरत, बुराई और भलाई के बारे में कुरान कहती है:

''बुराई को भलाई से दूर करो'' (क़ुरान 28 :54)

''और जो शख्स सब्र से काम ले और दूसरे के कसूर को माफ कर दे तो बेशक यह बड़ी हिम्मत का काम है।'' (क़ुरान 42 :43)

''बेशक अल्लाह तुम्हें इंसाफ़ और नेक काम करने का हुक्म देता है।'' (क़ुरान 16 :90)

"क़ुरान में जगह-जगह लोगों को सब्र करने और माफ़ करने की ताकीद की गई है। क़ुरान में 85 जगह अल्लाह को माफ़ करने वाला कहा गया है। अल्लाह ने अपने नबी से कहा है कि ''ऐ पैगम्बर! ईमान वालों से कह दो कि वे उनको भी माफ कर दिया करें जो अल्लाह के कर्म परिणामों की उम्मीद नहीं रखते, ताकि लोगों को उनकी करतूतों का बदला मिले। जो कोई अच्छा काम करता है तो अपने लिए ही करेगा और जो कोई बुरा काम करता है तो उसका बवाल उसी पर होगा। फिर तुम अपने रब की तरफ लौटाए जाओगे।'' (क़ुरान 45 : 14-15)

पर हो क्या रहा है? जो समझते  हैं और समझा  सकते हैं वही शिक्षित मुसलमान आज इन नसीहतों पर अमल नहीं कर रहे हैं. 

हे भाई और बहनों, प्रेम करो नफरत नहीं. 


Friday, October 31, 2008

ईश्वर ने अल्लाह से कहा

गुवाहाटी बम धमाकों के बाद, ईश्वर और अल्लाह की मीटिंग हुई. ईश्वर ने कहा, यार जब हमारे अनुयाई इंसानों का खून बहाते हैं तो मुझे बहुत तकलीफ होती है. इस से भी ज्यादा दुःख की बात यह है कि यह लोग यह खून खराबा हमारा नाम लेकर करते हैं. 

अल्लाह ने कहा, क्या करें भाई सब कुछ गड़बड़ा गया है. अब हम से तो कोई डरता ही नहीं. बस जो शैतानों ने कह दिया इन के लिए वही सही है. काम शैतान का और करते हैं हमारे नाम पर.

ईश्वर ने कहा, क्या करें, एक ब्लाग बनायें क्या? 

अल्लाह बोले, उस से क्या फायदा होगा, यह लोग उस पर भी गाली-गलौज शुरू कर देंगे और मुफ्त में बदनाम होंगे हम. सब लोग यही कहेंगे, ईश्वर-अल्लाह के ब्लाग पर देखो क्या जम कर गाली-गलौज हो रही है. 

ईश्वर ने कहा, मुझे तो डर लग रहा है, क्या होगा आगे?

अल्लाह ने निराशा से कहा, वही होगा जो शैतान चाहेगा. 

Thursday, October 30, 2008

बुरा इंसान

न हिंदू बुरा है,
न मुसलमान बुरा है,
करता है जो नफरत,
वह इंसान बुरा है.

ईश्वर ने बनाया है प्रेम, 
शैतान ने बनाई है नफरत.
प्रेम ईश्वर की पूजा है.
नफरत शैतान  का नाम दूजा है. 

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.

Wednesday, October 29, 2008

सब को मिले उजालों का संसार

    हे शारदे  माँ, हे शारदे माँ
    अज्ञानता  से हमें  तार दे माँ 

    तू स्वर की देवी  ये संगीत  तुझसे,
    हर शब्द तेरा है हर गीत तुझसे

    हम है अकेले, हम है अधूरे ,
    तेरी शरण  हम हमें प्यार दे माँ

    मुनियों  ने समझी, गुनियों  ने जानी,
    वेदों की भाषा, पुराणों की बानी

    हम भी तो समझे, हम भी तो जाने,
    विद्या  का हमको अधिकार दे माँ

    तू श्वेत वर्णी  कमल पे विराजे,
    हाथों में  वीणा, मुकुट  सर पे  साजे 

    मनसे  हमारे मिटाके  अंधेरे,
    हमको उजालों  का संसार  दे माँ

    हे शारदे माँ, हे शारदे माँ. 




Tuesday, October 28, 2008

ऐसा क्यों होता है?

हम मन्दिर मैं दान करते हैं,
हम गुरुओं को दक्षिणा देते हैं,
नेताओं की जेब भरते हैं,
जरूरी गैरजरूरी रिश्वत देते हैं,
सामाजिक रुतबे के लिए पैसे उड़ाते हैं,
पर एक गरीब की मदद नहीं करते.

Monday, October 27, 2008

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से

एक ब्लाग है 'मेरी डायरी'. सूत्रधार हैं फिरदौस. वह अपना परिचय यह कह कर देती हैं - 'मेरे अल्फाज़ मेरे जज़्बात और मेरे ख्यालात की तर्जुमानी करते हैं...और मेरे लफ्ज़ ही मेरी पहचान हैं...'

उनके ब्लाग की कुछ पोस्ट्स के शीर्षक देखिये:

रावण के साथ बजरंग दल का स्वाहा?

महाराष्ट्र : फ़सादियों को हुकूमत की खुली छूट

बेगुनाहों की गिरफ्तारियां और 'एनकाउन्टर' गहरी साज़िश का नतीजा

आईबी के अफ़सरान ने दी हिन्दू दहशतगर्दों को ट्रेनिंग

हिन्दू आतंकवाद : एक और साध्वी गिरफ्तार

हिन्दू आतंकवाद : भगवा चोले में छुपे आदमखोर

मालेगांव-मोडासा धमाकों में हिन्दू दहशतगर्दों का हाथ

समझ सको तो समझ कर देखो, इस्लाम सरापा रहमत है

निहत्थे मुसलमानों पर देसी केमिकल हथियारों से हमला किया गया

मुसलामानों का वक़ार और इस्लाम की अज़मत दाव पर

मुस्लिम क़ौम को अनपढ़ रखने की साज़िश

हम पुलिस हिरासत में बहुत ख़ुश हैं और हमने ही बम रखे थे

मुस्लिमों को बदनाम करने की साजिश हैं धमाके

इंडियन मुजाहिदीन का असली मास्टर माइंड कौन...?

मुसलमानों पर पुलिस का क़हर

''बुराई को भलाई से दूर करो'' : क़ुरान

इस तरह फिरदौस बुराई को जीत रही हैं भलाई से. किसी उर्दू पत्रिका की बात भी करती हैं फिरदौस. ऐसी लेखनी से क्या हासिल होगा? क्या इस से नफरत कम होगी, क्या प्यार और विश्वास बढ़ेगा समाज के अलग वर्गों में? फिरदौस एक शिक्षित और समझदार महिला हैं पर न जाने वह ऐसी भाषा क्यों प्रयोग कर रही हैं? कोई भी अपनी बात अगर सही तरह से कहे तो उसका असर सही होता है. ऐसी भाषा से मसले सुलझते नहीं, और उलझते हैं. मैंने कई बार उन से निवेदन किया है पर हर बार उन की भाषा और तीव्र हो जाती है.

ऐसा क्यों होता है?

हम मानते कुछ हैं
कहते कुछ हैं
करते कुछ हैं. 

प्रेम भगवान् का एक रूप है,
प्रेम ही मानो,
प्रेम ही कहो,
प्रेम ही करो. 

प्रेम करो सबसे, 
नफरत न करो किसी से. 

Sunday, October 26, 2008

इस दीवाली पर ...........

पटाखे चलाइये,
अपने अन्दर सोये इंसान को जगाने के लिए,
दिए जलाइये,
अपने अन्दर गहराते अन्धकार को मिटाने के लिए.

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. 

आप सबको दीवाली की शुभकामनाएं. 

Friday, October 24, 2008

अल्लाह, कृपया पधारें हमारे यहाँ इस दीपावली पर

चलो दीपावली पर,
इनवाईट करें अल्लाह को,
और देखें, 
हमारे ईश्वर से उनकी कैसी पटती है!

Tuesday, October 21, 2008

क्या कभी ऐसा होगा?

वह ईद मनाते हैं,
हम होली,
हम ईद मनाएंगे,
वह होली. 

Monday, October 20, 2008

जन्नत

जो नहीं जानते,
उस के लिए खो रहे हैं,
जो मिला हैं.
एक कहावत है,
हाथ की एक चिड़िया बेहतर है,
दो चिड़ियों से जो पेड़ पर बैठी हैं. 

Saturday, October 18, 2008

दुल्हन

स्वयम्वर में बने बैठे हैं,
मुसलमान एक दुल्हन,
रिझा रहे हैं उसे हर तरह से,
स्वघोषित धर्म-निरपेक्षी,
शायद डाल दे मेरे गले में,
वोटों का हार यह दुल्हन!

Friday, October 17, 2008

अल्पसंख्यकवाद या आतंकवाद की पैरवी

अल्पसंख्यकवाद कहूं या कहूं आतंकवाद की पैरवी. अब तो दोनों एक दूसरे में ऐसे घुल-मिल गए हैं जैसे दूध में शक्कर घुल-मिल जाती है. एक के बाद एक आतंकवाद के पैरोकार खड़े हो रहे हैं और सरकार पर दबाब डाल रहे हैं कि देश में हुए बम धमाकों की जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाय. पहले मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने आवाज उठाई - हमें पुलिस और पुलिस की जांच पर शक है इस लिए इन की जांच की जांच कराओ. फ़िर सरकार की वैशाखी पार्टियों ने यही आवाज उठाई. फ़िर जामिया नगर की यात्रा की उन्होंने जो कहते हैं कि हमने सरकार को गिरने से बचाया, और यही आवाज उठा दी. आने वाले चुनाव  से घबराई सरकार के कुछ मंत्री  भी जामिया नगर पहुँच गए और इस आवाज में आवाज मिलाने लगे. सरकार ने कुछ पुख्ता सबूत उन्हें दिखाए और वह संतुष्ट नजर आए. पर इस से घबरा गए अल्पसंख्यकवादी. कांग्रेस की अल्पसंख्यकवादी शाखा ने अब आवाज बुलंद की. उन्होंने कहा कि वह सोनिया से मिलेंगे, फ़िर उस के बाद मनमोहन से मिलेंगे, और उन्हें बताएँगे कि अल्पसंख्यकवाद की जन्मदाता कांग्रेस अब अपने धर्म को नहीं छोड़ सकती. अल्प्संख्यखों के वोट बिना यह मांग माने नहीं मिलने वाले. अब सरकार भी इस आवाज में आवाज मिलाने की तैयारी कर रही है. 

जल्दी ही हो सकता है कि पुलिस के आतंकवाद की जांच होने लगे और आतंकवादियों के आतंकवाद की जांच फाइलों में बंद हो जाए. वाह रे अल्पसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद के साए में पनपता आतंकवाद!

Tuesday, October 14, 2008

हिन्दुओं को कर्णाटक में गुस्सा क्यों आया

अगर आप जानना चाहते हें कि हिन्दुओं को कर्णाटक में गुस्सा क्यों आया तो इस लिंक पर जाइए -

हिन्दुओं को गुस्सा क्यों आया?

WHAT MADE HINDUS ANGRY IN KARNATAKA

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By François Gautier

06 Oct 2008 02:12:00 AM IST

WHAT MADE HINDUS ANGRY IN KARNATAKA

I WAS born in a Catholic family. My uncle was a priest, a wonderful
man of warmth and compassion and I spent most my early years in
Catholic boarding schools. When I was young I wanted to become a
missionary and to 'convert' pagans in Asia. What I was taught by
priests was that Hindus worship false gods and they needed to be
brought back to the True Word by Jesus Christ.

Then of course, I came to India and discovered that actually Hindus,
far from being the heathens, as had been portrayed in Europe, not only
believed God's diversity, the wonderful concept of avatar, but had
given refuge to all persecuted minorities of the world, whether the
Syrian Christians, the Parsis, the Jews (India is the only country in
the world where Jews were not persecuted), the Armenians, or today the
Tibetans.

I am also aghast at the one-sided coverage by the Indian media of the
Christian- Hindu problem: blasts after blasts have killed hundreds of
innocent Hindus in Varanasi, Delhi, Mumbai train blasts, Jaipur, etc.
Yet, neither Manmohan Singh nor Sonia Gandhi have pronounced once the
word 'Islamic terrorism.' But when furious Hindus, tired of being made
fun of, of witnessing their brothers and sisters converted by
financials traps, of seeing a 84-year-old swami and his Mataji
brutally murdered, of reading blasphemy about their Gods, vent their
anger against churches, many of them makeshifts, the Indian government
goes after the soft target which the Hindus are. The same thing
applies to the United States: they never warned Muslim organisations
in India about the killing of Hindus, but when dollars are used to buy
new converts and it angers the majority community of India,Washington
has the arrogance to issue a warning, and Manmohan Singh does not have
the pride to tell the US to mind its own business.

Neither the Indian press nor the western correspondents bothered to
write about what made Hindus angry in Karnataka: Newlife, one
important western funded missionary centre (
http://www.newlifevoice.org), began making conversions in and around
Mangalore by accosting poor people in market areas, or in bus stands,
befriending them and then taking them to churches to introduce them to
the father.

Upon introduction they were paid Rs 2,500 per person and then taken to
the Velankanni shrine, in Tamil Nadu, where they would get another Rs.
3,000.

When they finally converted to Christianity by changing the name, they
got an incentive of Rs 10,000 onwards.

Newlife would then give them instructions to abandon wearing tilak on
forehead, not to visit and offer prayers at the Hindu temples,
replacing the photos and idols of Hindu gods and goddesses with a
Cross, etc.

But what really angered local Hindus was when Newlife went one step
further and published a book in Kannada — Satya Darshini — which was
widely distributed by its missionaries. Here below is the translation
of some of the most abusive passages:

"Urvashi — the daughter of Lord Vishnu — is a prostitute.

Vashistha is the son of this prostitute.

He in turn married his own Mother. Such a degraded person is the Guru
of the Hindu God Rama. (page 48).

When Krishna himself is wallowing in darkness of hell, how can he
enlighten others? Since Krishna himself is a shady character, there is
a need for us to liberate his misled followers (page 50). It was
Brahma himself who kidnapped Sita.

"Since Brahma, Vishnu and Shiva were themselves victims of lust, it is
a sin to consider them as Gods. (page 39).

When the Trinity of Hinduism (Brahma, Vishnu and Shiva) are consumed
by lust and anger, how can they liberate others? The projection of
them as Gods is nothing but a joke. (page 39). God, please liberate
the sinful people of India who are worshipping False Gods. (Page 39)."

When blasphemy and much worse is brought against the most sacred Hindu
Gods, Hindus are supposed to take it meekly as sheep and let
themselves be converted to a foreign religion!

There are more than 4,000 foreign Christian missionaries involved in
conversion activities across different states.

In Tripura, there were no Christians at the time of independence.
There are 1,20,000 today, a 90 per cent increase since 1991.

The figures are even more striking in Arunachal Pradesh, where there
were only 1,710 Christians in 1961, but 1.2 million today, as well as
780 churches!

In Andhra Pradesh, churches are coming up every day in far-flung
villages and there was even an attempt to set up one near Tirupati.

Christians throughout the ages have strived on the concept of
persecution and as a brought up Catholic, I remember feeling bad about
all those martyred saints of Christianity. Christians in India like to
say that they are only two per cent and can do no harm. But it is a
sham: in the Tamil Nadu coastal belt from Chennai to Kanyakumari,
there must be now 10 per cent Christians post-tsunami and the same may
be true in other parts of south India.

My heart goes out to Karnataka Chief Minister BS Yeddyurappa who took
a courageous stand against unethical Christian conversions, but is now
under pressure from the Centre.

The BJP, having learnt from bitter experience that the Congress has no
qualm in invoking President's rule under fallacious pretexts in states
which are ruled by non-Congress governments is in a quandary: it must
show some action against militant Hindu groups while remaining true to
itself.

This is why Yeddyurappa took some action against Hindu groups while
saying that his government will not tolerate forcible conversions and
will take stringent action against missionaries involved in
conversions.

And ultimately, the blame must fall on Hindus: they are 800 million in
India, the overwhelming majority; they have the brains, they have the
money and they have the power. But either their intellectual and
political class sides with the minorities, out of fear, inferiority
complex imbedded by the British or just sheer crass political
opportunism, or the bigger mass is indifferent inert, selfish,
un-civic conscious. Every Hindu is the inheritor of the only surviving
spiritual knowledge which at the moment is under a concerted attack by
Christian missionaries, Americanisation, Marxism and Islamic
fundamentalism.

fgautier@rediffmail.com

ईसाई मिशनरियों द्बारा हिंदू धर्म को गाली-गलौज

एक ब्लाग (मोहल्ला) पर छपी एक टिपण्णी के अनुसार “न्यू लाईफ़ वॉइस” मिशनरी केन्द्र ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम रखा गया “सत्य दर्शिनी”, और इस बुकलेटनुमा पुस्तक को बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में वितरित किया गया। इस में छापा था:
"1) “…इन्द्रसभा की नृत्यांगना उर्वशी विष्णु की पुत्री थी, जो कि एक वेश्या थी…”।
2) “…गुरु वशिष्ठ एक वेश्या के पुत्र थे…”।
3) “…बाद में वशिष्ठ ने अपनी माँ से शादी की, इस प्रकार के नीच चरित्र का व्यक्ति भगवान राम का गुरु माना जाता है…” (पेज 48)।
4) “…जबकि कृष्ण खुद ही नर्क के अंधेरे में भटक रहा था, तब भला वह कैसे वह दूसरों को रोशनी दिखा सकता है। कृष्ण का चरित्र भी बहुत संदेहास्पद रहा था। हमें (यानी न्यूलाईफ़ संगठन को) इस झूठ का पर्दाफ़ाश करके लोगों को सच्चाई बताना ही होगी, जैसे कि खुद ब्रह्मा ने ही सीता का अपहरण किया था…” (पेज 50)।
5) “…ब्रह्मा, विष्णु और महेश खुद ही ईर्ष्या के मारे हुए थे, ऐसे में उन्हें भगवान मानना पाप के बराबर है। जब ये त्रिमूर्ति खुद ही गुस्सैल थी तब वह कैसे भक्तों का उद्धार कर सकती है, इन तीनों को भगवान कहना एक मजाक है…” (पेज 39)।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लोग भड़क गये और यही इन दंगों का मुख्य कारण रहा. यह सही है कि इस तरह की किताब बांटी गई, तो सवाल यह उठता है कि क्या यह भड़काऊ नहीं है जिससे मारकाट मच जाए??? ऐसे में सरकार ने क्या किया? क्या ऐसे संगठनों और मिशनरियों पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए????"

कारण को छुपाना और सिर्फ़ उस के परिणामों की निंदा करना ग़लत है. ग़लत परिणाम के कारण की भी निंदा की जानी चाहिए. पोप को तकलीफ होती है ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा से. पर इस किताब में की गई हिंसा से उन्हें तकलीफ नहीं होती. वह इस की निंदा नहीं करते. ऐसा ही हाल, वोट की राजनीति करने वाले नेताओं का है. ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष और महान साबित करने को बेकरार कुछ वुद्धिजीवी भी केवल हिन्दुओं को ही गालियाँ दे रहे हैं. यह लोग यह क्यों नहीं समझते की जब तक ईसाई मिशनरी अपनी ग़लत हरकतें बंद नहीं करते तब तक उन के ख़िलाफ़ यह हिंसा बंद नहीं होगी. यह आज की बात नहीं है, न जाने कब से यह चल रहा है. लोग बर्दाश्त करते हैं, पर जब हिंदू धर्म को की जा रही गाली-गलौज हद से बाहर हो जाती तो लोग उस का उत्तर देने को मजबूर हो जाते हैं. किसी धर्म की निंदा करके, उस के अनुयायिओं का धर्म बदल कर, कोई चाहे कि वह मजे से रहेगा तो यह उस का भ्रम है. देर सबेर उसे अपनी इस हिंसा का परिणाम भुगतना ही होगा. क्या हिंदू इंसान नहीं हैं? क्या उन्हें तकलीफ नहीं होती.

हिंसा विचार, शब्द, कर्म तीनों से होती है. हिंसा हर रूप में निंदनीय है. एक तरफा निंदा आग में घी डालने का काम करती है. कोई नहीं जानता मरने के बाद क्या होगा. इस जिंदगी को तो प्रेम से जी लो. ख़ुद भी प्रेम से रहो और दूसरों को भी प्रेम से रहने दो.

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.

Sunday, October 12, 2008

एक तरफा बात से मुद्दे और उलझते हैं

आज कल आतंकवाद और मजहबी दंगों पर जम कर बहस चल रही है. ज्यादातर लोग एक तरफा बहस कर रहे हैं. इस से मुद्दे सुलझने की बजाय और उलझ रहे हैं. कुछ लोगों की नजर में सारे मुसलमान आतंकवादी हैं. दूसरे कुछ लोगों की नजर में सारी गलती हिन्दुओं की है. यह लोग समाज के हर वर्ग से हैं, पुलिस से हैं, सरकार से हैं, मीडिया से हैं, धर्म गुरु हैं, शिक्षा संस्थानों से हैं. कुछ लोग इन बुराइयों के लिए धर्म को जिम्मेदार करार देते हैं. कुछ लोग पुलिस को गालियाँ देते हैं. सब एक-पक्षीय बात करते हैं. बस अपना पक्ष कहना. दूसरे पक्ष की बात ही सुनना नहीं चाहते यह लोग. क्या इस से यह समस्यायें सुलझेंगी? मेरे विचार में तो नहीं. अगर लोग ऐसे ही चिल्लाते रहे तो समस्यायें और उल्झेंगी.

हिंदू हों, या मुसलमान हों, या ईसाई हों, इसी देश में रहते हैं, और आने वाले समय में भी इसी देश में रहेंगे. क्या इसी तरह लड़ते रहना है या मिल जुल कर रहना है? अगर मिल जुल कर रहना है तो दूसरे की बात भी सुनो, उसे क्या तकलीफ है यह जानने की कोशिश करो. एक तरफा बातें करना बंद करो. नहीं तो लड़ते रहो, आज तुमने उन्हें पटक दिया कल वह तुम्हें पटक देंगे, फ़िर तुम उन्हें पटक देना, बस ऐसे ही करते रहो.

कल राष्ट्रीय एकता परिषद् की मीटिंग है जिसमें तुम्हारे और दूसरों के वोट के इच्छुक पहलवान कुश्ती लड़ेंगे. नफरत के दांव लगायेंगे. एक दूसरे को गालियाँ देंगे. फ़िर तुम्हारी तरफ़ देखेंगे कि तुम उन की कुश्ती से खुश हुए या नहीं. यह तुम्हें तय करना है कि तुम नफरत करते रहोगे या प्रेम से मिल जुल कर रहोगे.

Thursday, October 09, 2008

क्या बुराई बाकई जल जाती है?

दशहरे पर रावण, कुम्भकरण और मेगनाध के पुल जलाए जाते हें यह प्रतीक हें अच्छाई की बुराई पर विजय के पर क्या इन पुतलों को जलाने से बुराई बाकई जल जाती है? आइये इस विजयदशमी पर हम अपने अन्दर की बुराई को पूरी तरह जला दें
आइये एक वीडियो भी देखें।

Tuesday, October 07, 2008

इंसानियत क्या धर्म देख कर जागती है?

ईशर ने सबको इंसान बना कर पैदा किया. वह किसी इंसान में अन्तर नहीं करता. वह सब से प्रेम करता है. प्रेम उस का एक रूप है. पर हमने उसे बाँट दिया. हमने इंसानों को बाँट दिया. अलग-अलग धर्म बना दिए. हर धर्म का एक ईश्वर तय कर दिया. ठीक है. मैं इस में कोई बुराई नहीं देखता, पर बुरा हुआ तब जब हम धर्म और ईश्वर के नाम पर लड़ने लगे, मेरा ईश्वर सही है, मेरा ईश्वर सब से बड़ा है. यह तो ईश्वर की इच्छा के ख़िलाफ़ बात हुई.

हम इंसान हैं. इंसानियत एक ऐसा जज्बा है जो इंसान को ईश्वर की सब से सुंदर रचना बनाता हैं. पर हम ने इंसानियत को इंसान से दूर कर दिया. हमने इंसानियत को एक गहरी नींद सुला दिया. जो तब जागती है जब हमारे धर्म का कोई व्यक्ति मरता है. दूसरे धर्म का व्यक्ति जब मरता है तब यह सोती रहती है. उन के लिए हमने इस का उल्टा रूप हैवानियत तैयार कर रखा है.

अपने धर्म वालों के लिए इंसानियत और दूसरों के लिए हैवानियत. यह आज कल के इंसान का असली रूप बनता जा रहा है.

Sunday, October 05, 2008

रोटी बनाइये ईनाम पाइए

क्या आपको भूख लगी है? भूख सब को लगती है, आप को भी लगी होगी. आइये भूख मिटाने के लिए रोटी बनायें,

एक शर्त है, आप जिस धर्म के हैं उसी धर्म के मानने वाले रोटी बनाने में मदद करेंगे. कभी भी, किसी समय भी किसी गैर धर्म वाले का हाथ यह रोटी बनाने में न लगा हो.

मसलन, अगर आप हिंदू है तो जमीन हिंदू की हो, उस में जो बीज बोया गया हो वह हिंदू द्वारा तैयार किया गया हो, बीज बोने वाले हिंदू हों, जो पानी इस्तेमाल किया गया हो वह हिंदू का हो, जो हल इस्तेमाल किया गया हो वह हिंदू का हो, हल बनाने में जो समान इस्तेमाल किया गया हो वह हिंदू का हो और हिंदू द्वारा ही तैयार किया गया हो, इस हिंदू गेहूं को पीसने वाले हिंदू हों, इस हिंदू आटे को गूंथने के लिए जो पानी इस्तेमाल किया जाय वह हिंदू का हो, बर्तन हिंदू द्वारा बनाये गए हों, चकला-बेलन, चिमटा हिंदू का हो, तवा हिंदू का हो, ईंधन हिंदू का हो, इत्यादि-इत्यादि.

अगर आप मुसलमान हैं तो सब कुछ मुस्लिम होना चाहिए. अगर आप ईसाई हैं तो सब कुछ ईसाई.

इन सब शर्तों के साथ जो रोटी बनाएगा उसे ईनाम मिलेगा.

आइये, हिंदू, मुस्लिम, क्रिस्चियन रोटी बनाइये और ईनाम पाइए.

Thursday, October 02, 2008

ईद मुबारक, ईद मुबारक, ईद मुबारक ........

आप सबको ईद मुबारक। इन्हें आप एसएम्एस के रूप में भेज सकते हें. फ़िर देखिये नीचे एक वीडियो।

मुबारक नाम है तेरा,
मुबारक ईद हो तुझको,
जिसे तू देखना चाहे उसी की दीद हो तुझको,
ईद मुबारक.

कोई इतना चाहे तुम्हे तो बताना,
कोई तुम्हारे इतने नाज़ उठाये तो बताना,
ईद मुबारक तो हर कोई कह देगा तुमसे,
कोई हमारी तरह कहे तो बताना.
ईद मुबारक

जब कभी बिन मांगे आप पर खुशिओं की बरसात हो,
जब कभी आप का दिल अनजानी खुशी से बेताब हो,
तो समझ लेना कोई आप को दुआओं मैं याद कर रहा है.
ईद मुबारक

ईद लेके आती है ढेर सारी खुशिया ,
ईद मिटा देती है इंसान में दूरियां,
ईद है खुदा का एक तोहफा,
इसी लिए कहते है सब,
ईद मुबारक.

आज से अमीरी गरीबी के फासले न रहे,
हर इंसान एक दूजे को अपना भाई कहे,
आज सब कुछ भूल कर आ गले लग जा,
मुबारक हो तुझे यह ईद का त्यौहार.

आज खुदा की हम पर हो मेहरबानी,
करदे माफ़ हम लोगो की सारी नाफ़रमानी,
ईद का दिन आज आओ मिलके करे यही वादा,
खुदा की ही राहो में हम चलेंगे सदा.
सबको ईद मुबारक

सुनहरी धूप बरसात के बाद ,
थोडी सी खुशी हर बात के बाद,
उसी तरह हो मुबारक आप को ये नई सुबह कल रात के बाद,
ईद मुबारक.

सदा हँसते रहो जैसे हँसते हैं फूल,
दुनिया के सारे गम तुम्हें जाए भूल,
चारों तरफ़ फैलाओ खुशिओं के गीत,
ऐसी उम्मीद का साथ यार तुम्हे...
मुबारक हो ईद.

ईद मुबारक हो आपको,
ढेर सारी तारीफ़ और खुशिया मिले आपको,

Monday, September 29, 2008

नवरात्रों की शुभकामनाएं

कल से नवरात्रे प्रारंभ हो रहे हैं. नों दिन तक सारा भारत मां की भक्ति और प्रेम में डूबा रहेगा. आप सब पर मां की कृपा बनी रहे.

Friday, September 26, 2008

है ईश्वर!!!

आकांक्षा पारे ने 'मोहल्ला' पर जो कविता लिखी वह मुझे बहुत अच्छी लगी।

मैं नहीं जानता यह सही है या ग़लत, पर हाँ अगर उसे मैं लिखता तो ऐसी होती वह कविता:

ईश्‍वर!
सड़क बुहारता भीकू मुझे अपवित्र नहीं करता,
उस से छूकर भी बिल्कुल पवित्र पहुंचता हूं तुम्‍हारे मंदिर में
तुम्हारा अंगना भी तो वह ही बुहारता है.

ईश्‍वर!
जूठन साफ करती रामी के बेटे की नज़र नहीं लगती,
तुम्‍हारे लिए मोहनभोग की थाली पर,
इस लिए उसे ढंकने की जरूरत नहीं पड़ती
क्योंकि तुम्ही तो खाओगे उसे
रामी के बेटे के रूप में.

ईश्‍वर!
दो चोटियां गुंथे रानी आ कर मचले तो
तुम्‍हारे शृंगार के लिए तोड़े फूल
उसे दे देता हूँ
क्योंकि रानी में तुम्हारा रूप ही तो है

ईश्‍वर!
अभी परसों मैंने रखा था व्रत
दूध, फल, मेवे और मिठाई खूब खाई
तुम हँसते तो होगे मेरे इस नाटक पर
पर घर वालों ने खूब तारीफ़ की.

ईश्‍वर!
ख़ुद को तुम्‍हारा प्रतिनिधि समझने वाले पंडितों से पहले,
मैंने खिलाया जी भर,
दरवाज़े पर दो रोटी की आस लिये आये व्‍यक्ति को
फ़िर चरण छू कर लिया आशीर्वाद
मैंने पहचान लिया था तुम्हें.

ईश्वर!
अपने हिसाब से पूजता रहा तुझे,
अपने हिसाब से भुनाता रहा तुझे,
अपने हिसाब से बांटता रहा तुझे,
फायदा मिला तो मैंने किया,
नुक्सान हुआ तो तेरे मत्थे.

ईश्‍वर!
इतने बरसों से
तुम्‍हारी भक्ति, सेवा और श्रद्धा में लीन हूं
यह भक्ति, सेवा और श्रद्धा बनी रहे
मुझे विश्वास है आओगे एक दिन दर्शन देने,
जैसे आए थे शबरी के घर.

काबा से संबधित कुछ और तस्वीरें

काबा इंटीरियर से सम्बंधित कुछ और तस्वीरें भी -मेल में आई थीं उन्हें भी पोस्ट कर रहा हूँ उम्मीद करता आप सब को पसंद आएँगी

एक निवेदन है आपसे अगर किसी को इन या पिछली पोस्ट की तस्वीरों के बारे में जानकारी हो तो टिपण्णी के रूप में पोस्ट करें










Thursday, September 25, 2008

काबा - कुछ तस्वीरें

रमजान चल रहे हैं. यह तस्वीरें मुझे ई-मेल में मिलीं। सोचा आप से बांटता चलूँ।
गर्ल्ज्ग्रुप से साभार

Tuesday, September 23, 2008

क्यों हो रहे हैं हमले चर्चों पर?

किसी भी धार्मिक स्थान पर हमला करना ईश्वर के प्रति अपराध है.
पर जहाँ जगह मिली, सरकारी जमीन पर भी, मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा बना देना भी अपराध है.
क्या मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा की संख्या कम है इस देश में, कि जहाँ मौका मिलता है नया बनाना शुरू कर देते हैं?
किसी को कोई तकलीफ नहीं अगर सब अपने-अपने धर्म के अनुसार आचरण करें और दूसरों को उन के धर्म के अनुसार आचरण करने दें.
पर अगर कुछ धर्मों के लोग दूसरों के धर्म में हस्तक्षेप करने लगें तो यह ग़लत है. इस से दूसरों को तकलीफ होती है. जब यह तकलीफ सहन शक्ति से बाहर हो जाती है तो वह विरोध करते हैं.
अगर किसी धर्म के अनुयायी यह कहते हैं कि उन का धर्म उन्हें दूसरों का धर्म बदलने की आज्ञा देता है तो यह ग़लत है.
किसी को किसी का धर्म बदलने का अधिकार नहीं है.
कोई गरीब है, कोई तकलीफ में है, इसलिए उसे कहा जाय कि तुम अपना धर्म बदल लो तो हम तुम्हारी मदद करेंगे, यह भी ईश्वर के प्रति अपराध है. क्या इन का धर्म यह कहता है कि केवल अपने धर्म वालों की मदद करो? किसी दूसरे धर्म वाले की मदद तब करो जब तो तुम्हारे धर्म में शामिल हो जाए. यह तो धर्म नहीं है. यह तो बहुत ग़लत बात है.
आज चर्चों पर हमले हो रहे हैं. इस की खूब निंदा की जा रही है. की भी जानी चाहिए. पर साथ ही धर्म बदलने की भी निंदा की जानी चाहिए. कोई इस की निंदा क्यों नहीं करता? लोग कारण के परिणाम को ग़लत कहते हैं, कारण को ग़लत क्यों नहीं कहते?
अल्पसंख्यकों को अपने धर्म के अनुसार आचरण करने की पूरी आज़ादी है इस देश में. पर अगर यह अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों का धर्म बदलने का षड़यंत्र करेंगे तो उस का अगर अनपेक्षित परिणाम भुगतना हुआ तो इस के लिए यह ख़ुद जिम्मेदार हैं. अगर बबूल बोयेंगे तो आम नहीं मिलेंगे, बबूल ही मिलेगा.
धर्म परिवर्तन बंद कीजिए, चर्चों पर हमले बंद हो जायेंगे.

Sunday, September 21, 2008

तुम्हारा धर्म क्या है, यह कौन तय करेगा?

प्रेम ईश्वर का धर्म है.
नफरत शैतान का धर्म है.
यह तुम्हें तय करना है,
कि तुम किस धर्म के हो?

आतंकवादियों को तुम्हारे धर्म को बदनाम मत करने दो.
नेताओं को तुम्हारे धर्म से खिलबाड़ मत करने दो.
आतंकवादी किस के दुश्मन हैं?, पहचानो.
कभी कोई नेता मरा है बम धमाको में?
जो मरे वह आम आदमी थे, तुम्हारे जैसे.
वह तुम भी हो सकते थे.
वह हिंदू भी थे, मुसलमान भी.
सिख भी और ईसाई भी.

आतंकवादी आम आदमी के दुश्मन हैं.
तुम यह क्यों नहीं समझते?
वह लड़ाना चाहते हैं हिंदू और मुसलमानों को.
यही नेता भी चाहते हैं.
पिछले साठ-सत्तर सालों से वह यही कर रहे हैं.
हर बम धमाके के बाद वह तिलमिला जाते हैं.
क्योंकि उनका मकसद पूरा नहीं होता.
कितने आम आदमी मर जाते हैं.
पर हिंदू-मुस्लिम झगड़ा नहीं होता.
मैं नमन करता हूँ आम आदमी को,
वह मर जाता है पर इन का मकसद पूरा नहीं होने देता.

मुझे यही तकलीफ हमेशा होती है.
कि तुम अपने दुश्मनों को अभी भी नहीं पहचान रहे.
आतंकवादी तुम्हारे दुश्मन हैं.
आतंकवादी और नेता एक सिक्के के दो पहलू हैं.
आम आदमी का दोस्त केवल आम आदमी है.
जो हिंदू है, मुसलमान भी,
सिख भी है और ईसाई भी.
यह सीधी सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आती?

Friday, September 19, 2008

बम धमाकों के बाद का आतंकवाद

दिल्ली में बम धमाके हुए. बहुत से निर्दोष नागरिक मारे गए. इनके कातिलों ने क्या हासिल किया यह तो वही जानें, पर बहुत से परिवारों ने अपना सब कुछ खो दिया. रोज अखबारों में आतंकवाद की भेंट चढ़ गए इन मासूम इंसानों औए उनके गम में डूबे परिवार जनों के बारे में खबरें आ रही हैं. साथ ही आ रही हैं, एक और आतंकवाद की खबरें जो वरपा किया है सरकार और उस के बाबुओं ने.

एक दिन सुना कि बाबुओं ने सहायता के चेक बना दिए मृतकों के नाम में. मेरे एक मित्र बहुत नाराज थे इस बात पर, कहने लगे जिस बाबु ने चेक बनाया है उसे ही मृतक के पास पर्सनल डिलीवरी के लिए भेजना चाहिए. बहुत से लोग गरीब हैं, उन के पास बेंक एकाउंट नहीं हैं. वह कैसे इन चेकों को केश करेंगे? बहुत से पीड़ित अभी तक इंतज़ार कर रहे हैं किसी सहायता की. सरकार ने घोषणा कर दी सहायता की पर कैसे वह सहायता पहुँचेगी पीड़ितों तक इस के बारे में कोई चिंता नहीं की. कैसी सरकार है यह, इसे पता था कि दिल्ली में धमाकों की तैयारी हो गई है, पर इस सरकार ने कुछ नहीं किया. बस बड़ी बेशर्मी से पाटिल ने कह दिया कि हमें यह पता नहीं था कि धमाके कहाँ और कब होंगे. ऐसी सरकार और ऐसे ग्रह मंत्री का क्या फायदा?
अब राजनीति कर रही है सरकार.

कभी मुझे लगता है कि अगर आज कहीं बम धमाका नहीं हुआ तो वह आतंकवादियों की वजह से है, उन्होंने बम धमाका करने का कोई कार्यक्रम ही नहीं बनाया था. इस में इस देश की सरकार, पुलिस, खुफिया एजेंसियां का कोई योगदान नहीं है. आज कोई भारतीय नागरिक अगर जिन्दा है तो इस लिए नहीं कि सरकार ने उसे बचा लिया है, बल्कि इस लिए कि आतंकवादियों ने कोई धमाका नही किया या उस का आखिरी वक्त अभी नहीं आया है. अब इस देश में कोई भी सुरक्षित नहीं है, सिवाय इन घटिया नेताओं और उन के परिवारवालों के.

Tuesday, September 16, 2008

इंसानियत के कातिलों दफा हो जाओ

मजहब के नाम पर इंसानों का खून बहाने वाले कातिलों दफा हो जाओ इस मुल्क से, और ले जाओ अपने साथ उन सबको जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से तुमसे हमदर्दी रखते हैं या खून बहाने में तुम्हारी मदद करते हैं. इन में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी, पर अब वह सिर्फ़ कातिल हैं, और कातिलों का कोई मजहब नहीं होता. यह सिर्फ़ इंसानियत के दुश्मन हैं. इंसानी हमदर्दी नाम की कोई चीज इन के अन्दर नहीं है. दिल्ली में जिन का खून वहा वह इंसान थे. तुमने उन्हें मार कर अपनी शान में कसीदे पढ़े. तुम्हारे कुछ हिमायतियों ने कुरान का वास्ता दे कर यह समझाया कि कुरान इस की इजाजत नहीं देता. तुम्हारे कुछ और हिमायतियों ने कुछ हिंदू संगठनों का नाम ले कर तुम्हारे इस खून-खराबे को सही साबित करने की कोशिश की. वोटों का कारोबार करने वालों ने मजहब को बीच में लाकर मुसलमानों के वोट पक्के करने की कोशिश की. पर किसी ने भी अपनी जुबान या अपने कलम से सहानुभूति के दो शब्द नहीं कहे या लिखे उन निर्दोष इंसानों के बारे में जो मर गए और जिनके परिवार दुःख और तकलीफ के समंदर में डूब गए हैं.

मुझे इस देश के मुसलमानों और उन के हिमायतियों से यह पूछना है. यह बार-बार कुरान का वास्ता क्यों देते हो तुम लोग? क्या कभी किसी ने यह कहा है कि कुरान ग़लत है? क्या कभी किसी ने इस्लाम को ग़लत कहा है? सब मानते हैं और कहते हैं कि कोई धर्म हिंसा करने की इजाजत नहीं देता. हाँ यह जरूर कहा है कि इंसानियत के दुश्मन धर्म की शिक्षाओं का ग़लत मतलब करके भोले-भाले इंसानों को बहकाते हैं. यह कहना तो ग़लत नहीं है. और यह बात सब धर्मों के लोगों पर लागू होती है. अगर तुम यह मानते हो कि जो कुछ हो रहा है ग़लत है और इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ है, तो तुम इन कातिलों की निंदा क्यों नहीं करते. सिर्फ़ कुरान की बात करके ही खामोश क्यों हो जाते हो? क्यों नहीं इन कातिलों को बेनकाब करते? क्यों नहीं इन को मुस्लिम बिरादरी से बाहर करते? जो गैर-मुस्लिम तुम्हारे हिमायती बनते हैं, उनसे क्यों नहीं कहते, 'अपनी बकवास बंद करो, बहुत इस्तेमाल कर लिया तुमने हमें अपने फायदे के लिए, अब हमें तुम्हारी इस नाजायज हमदर्दी की जरूरत नहीं है'?

अगर तुम्हे तकलीफ होती है इस बात से कि हर खून-खराबे के बाद मुसलमान कठघरे में क्यों खड़े कर दिए जाते हैं तो तुम खुले शब्दों में इन खून-खराबों की निंदा करके ख़ुद को इन कातिलों से अलग क्यों नहीं करते? क्यों इधर-उधर की बातें करके मामले को उलझाते हो? इस से दूसरों के मन में अविश्वास बढ़ता है. जो मरे हैं वह आम आदमी हैं, उन में हिंदू भी हैं, मुसलमान भी. उनके साथ खड़े हो जाओ, उन की तकलीफ महसूस करो. इधर-उधर की बातें कर के उनके जख्मों पर नमक मत छिड़को.

इस मुल्क में यह कहना कि 'इस्लाम खतरे में है', क्या परले दर्जे की वेबकूफी नहीं है? इस्लाम इस मुल्क में क्या आज की बात है? कितने साल तो मुस्लिम शासकों ने ही राज किया इस देश पर. अंग्रेजों की हुकूमत के ख़िलाफ़ हिंदू और मुसलमान दोनों मिल कर लड़े. पर कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए हिंदू-मुसलमानों को ही लड़वा दिया, और आज भी लड़वा रहे हैं. क्या तुम यह सब नहीं जानते? क्या अब भी तुम्हें यह बताने की जरूरत है? इस्लाम और मुसलमान हिन्दुस्तान से ज्यादा किसी और देश में सुरक्षित नहीं हो सकते. हिन्दुस्तान ही एक ऐसा मुल्क है जहाँ एक मुसलमान, राष्ट्रपति बन सकता है, चीफ जस्टिस बन सकता है, फौज का अफसर बन सकता है. यह बात तुम क्यों भूल जाते हो?

इंसानियत के इन दुश्मनों का साथ मत दो. निर्दोष इंसानों का खून बहाना अल्लाह के, भगवान् के ख़िलाफ़ अपराध है. इन की हिमायत करके तुम भी इस अपराध में शामिल हो रहे हो. जरा सोचो, क्या ऐसा करके तुम अपना ही नुक्सान नहीं कर रहे हो? क्या जवाब दोगे अल्लाह को, भगवान को? अभी भी समय है चेत जाओ, ख़ुद को इन कातिलों से अलग करो और धकेल दो इन्हें इस मुल्क के बाहर.

Monday, September 15, 2008

मुझे बचपन से यही तालीम मिली है

एक ब्लाग है, 'मेरी डायरी'. उस की सूत्रधार हें फिरदौस। उन की हाल की पोस्ट में मुझे एक बात बहुत अच्छी लगी। आप भी पढ़िये। उन की यह बात यहाँ पोस्ट करने से पहले मैंने उन की इजाजत नहीं ली है, पर यह उम्मीद करता हूँ वह बुरा नहीं मानेंगी। अगर बुरा मानेंगी तो यह बात इस पोस्ट से हटा दूँगा।

"मैं भी जब रात को सोती हूं तो दिल से उन सभी लोगों को माफ़ कर देती हूं, जिन्होंने मेरा बुरा किया हो...और अल्लाह से भी दुआ करती हूं कि उन्हें माफ़ कर देना...और जाने या अनजाने में मुझसे कुछ ग़लत हो गया हो तो उसके लिए भी मुझे माफ़ कर देना...मुझे बचपन से यही तालीम मिली है..."

मेरी मां सोने से पहले और सुबह विस्तर से उठने से पहले ईश्वर की प्रार्थना करती थीं। मैं भी कोशिश करता हूँ यह करने की। बहुत शान्ति मिलती है इस से।

आज का अखबार पढ़ कर मन बहुत दुखी हुआ। अखबार उन निर्दोष नागरिकों के बारे में ख़बरों से भरा हुआ है जो दिल्ली के बम धमाकों में मारे गए, और अब उन के परिवारों पर क्या गुजर रही है? ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे और उन के परिवारों को हिम्मत दे इस दुःख को सहन करने की। हम सब ईश्वर का धन्यवाद करें कि उस की कृपा से हम सुरक्षित हें। मरने वालों में हम भी हो सकते थे।

प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से।

Sunday, September 14, 2008

नहीं यह अल्लाह की मर्जी नहीं हो सकती

जिस अल्लाह के नाम पर कल कुछ कातिलों ने दिल्ली में बहुत से निर्दोष इंसानों को मार डाला वह अल्लाह नहीं हो सकता. अल्लाह तो प्रेम का एक रूप है. सारे इंसान उस के बच्चे हैं. कोई पिता अपने बच्चों में भेदभाव नहीं करता. कोई पिता यह नहीं चाह सकता कि उस के कुछ बच्चे दूसरे बच्चों को मार डालें. यह कातिल शैतान के बच्चे हैं और अल्लाह को बदनाम कर रहे हैं. अल्लाह के हर बन्दे का यह कर्तव्य है कि वह इन कातिलों को बेनकाब करे. इन की मदद करना, इन्हें अपने घर में पनाह देना, इन के द्वारा किए जा रहे खून खराबे को मजहब के नाम पर सही ठहराना, अल्लाह के ख़िलाफ़ एक ऐसा गुनाह है जिस की कोई माफ़ी नहीं हो सकती.

मेरे मन में कुछ सवाल उठते हैं. क्या कोई सच्चा मुसलमान रमजान के महीने में किसी इंसान का खून बहा सकता है? क्या इस्लाम इस की इजाजत देता है? क्या निर्दोष इंसानों का खून बहा कर कोई अपने को मुसलमान कह सकता है? क्या मुसलमानों को ऐसे कातिलों को अपनी मुस्लिम बिरादरी का हिस्सा मानना चाहिए? क्या अल्लाह और शैतान के बन्दे एक साथ रह सकते हैं? क्या उन में कोई भाईचारा हो सकता है. अगर इन सवालों का जबाब 'नहीं' है तो हिन्दुस्तान के मुसलमान इन कातिलों से अपने रिश्ते क्यों नहीं तोड़ते, क्यों इन कातिलों को अपनी बिरादरी से बाहर नहीं निकालते, क्यों इन कातिलों को 'शैतान की औलाद' करार देते? इस सब के बाद एक सवाल उठता है - 'क्या हिन्दुस्तान के मुसलमान इन कातिलों के साथ हैं, और इस खून-खराबे में इन कातिलों का साथ देते हैं?

यही सवाल इस देश की सरकार से भी पूछता हूँ में. और यह सवाल भी कि वह क्यों इन कातिलों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने से डरती है? यह सरकार ऐसा क्यों सोचती है कि इन कातिलों को फांसी पर लटकाने से हिन्दुस्तान के मुसलमान उस के ख़िलाफ़ हो जायेंगे? क्या इस का सीधा मतलब यह नहीं है कि यह सरकार मानती है कि इस खून-खराबे में हिन्दुतान के मुसलमान शामिल हैं? इन के वोट हासिल करने के लिए वह कब तक निर्दोष हिन्दुस्तानियों का खून बहाती रहेगी?

लालू, पासवान और मुलायम उस सरकार में मंत्री हैं जो सिमी को एक आतंकवादी संगठन मानती है. जिस सरकार के मुखिया ने कल कहा कि इन कातिलों के ख़िलाफ़ लड़ाई उन की सरकार की मुख्य प्राथमिकता है. सिमी और उस के द्वारा किए जा रहे खून खराबे को समर्थन देने वाले यह जन-देश-विरोधी नेता कैसे उस सरकार में मंत्री बने हुए हैं? क्यों नहीं सरकार के मुखिया इन जन-देश-विरोधी नेताओं को अपनी सरकार से बर्खास्त करते और उन के ख़िलाफ़ कार्यवाही करते? कितने और हिन्दुस्तानियो को मरवाएगी यह सरकार?

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में हिन्दुस्तान के मुसलमानों को रमजान की मुबारकवाद दी थी. अब मैं क्या कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा.

Sunday, September 07, 2008

यह कैसे अल्पसंख्यक हें?

भारत में ईसाई अल्पंख्यक हें इसलिए उन्हें अपने धर्म के अनुसार जीवन यापन करने के लिए हर आजादी और सुविधाएं दी जाती हें। उन्हें यहाँ तक भी आजादी दे दी गई है कि वह सही-ग़लत हर तरीके से बहुसंख्यक हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करें। बहुत ऊंची-ऊंची बातें कही जाती हें इसके समर्थन में. कहा जाता है की हर व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का अधिकार है. अगर यह अधिकार है तो कोई कैसे किसी हिंदू के हिंदू होने के अधिकार को छीन सकता है, उसे जबरन या लालच दे कर? अफ़सोस की बात यह है की बहुत सारे हिंदू भी इस ग़लत बात के पक्ष में बोलते हैं.

कंधमाल में इसाई जबरन धर्म परिवर्तन में लगे हैं.एक स्वामी जी इसका विरोध कर रहे थे। उनकी और उन के चार चेलों की हत्या कर दी गई. इस पर वहां के हिंदू भड़क उठे और दंगा हो गया। इससे पादरियों ने चिल्लाना शुरू किया, फ़िर पोप चिल्लाये, पादरी प्रधानमंत्री से मिले, अदालत ने प्रदेश सरकार को ईसाइयों को बचने के निर्देश दिए, पर किसी ने भी स्वामी जी और उनके चेलों की हत्या की निंदा नहीं की। किसी ने भी पादरियों से यह नहीं कहा कि आप धर्म परिवर्तन करना बंद क्यों नहीं करते। किसी ने भी इन्हें यह नहीं समझाया कि आप को जो आजादी और सुविधाएं मिली हें आप उनका नाजायज फायदा उठाना बंद करें। बस इस देश में सारी सीख हिन्दुओं के लिए है - भाई आप बहुसंख्यक हें इस लिए मरो और चुप रहो।


आज अखबार में एक लेख छपा है कि कैसे ईसाई मत का धंदा हो रहा है? कैसे रोज नए-नए चर्च बन रहे हें? आप भी पढ़िये

Friday, September 05, 2008

यह स्कूल है, मन्दिर नहीं

जयपुर के एक ईसाई स्कूल में कुछ छात्र इस लिए निष्काषित कर दिए गए क्योंकि उन्होंने अपने क्लास रूम में गणेश पूजा की। ऐसा करते हुए स्कूल प्रशासन ने कहा कि यह स्कूल है मन्दिर नहीं। अजीब बात है कि एक स्कूल चर्च तो हो सकता है पर मन्दिर नहीं हो सकता। एक स्कूल मस्जिद हो सकता है पर मन्दिर नहीं हो सकता।

बचपन में पढ़ा था कि स्कूल ज्ञान का मन्दिर होते हें। पर शायद यह बात सब स्कूलों पर लागू नहीं होती। कुछ स्कूल ज्ञान का चर्च होते हें। इन्हें मन्दिर की तरह देखने पर सजा मिलती है। सारे संसार में शायद भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ लोग ऐसा कह सकते हें और छात्रों को स्कूल से निकाल सकते हें।

हिन्दू संघटनों ने इसका विरोध किया। ईश्वर की कृपा से मामला सुलझ गया। स्कूल प्रशासन ने छात्रों को स्कूल में वापस लेने का निर्णय किया। मगर एक बात की कमी रही। इस बात पर पोप का कोई बयान नहीं आया। शायद वह तब बयान देते जब हिंसा हो जाती और कोई ईसाई मारा जाता। जैसा उन्होंने उड़ीसा के सन्दर्भ में कहा।

Tuesday, September 02, 2008

क्यों परेशां हो बदलने को धर्म दूसरों का?

पोप ने उड़ीसा में हुई हिंसा पर दुःख प्रकट किया और निंदा की. लेकिन यह दुःख और निंदा दोनों अपने ईसाई भाई-बहनों के लिए थी. हिंदू भाई-बहनों के लिए न उनके पास दिल है और न समय. जो ईसाई इस हिंसा में मरे उनके लिए पोप ने आंसू बहाए, पर स्वामीजी और उनके चार चेलों के लिए न उनके पास आंसू हैं और न कोई सहानुभूति का शब्द.

शुरुआत किसने की? स्वामीजी और उनके चार चेलों को क्यों मारा गया? क्या यह धर्म के नाम पर हिंसा नहीं है? इन लोगों को मार कर ईसाई क्या सोच रहे थे कि हिन्दुओं को दुःख नहीं होगा? क्या वह चुपचाप कभी मुस्लिम आतंकवादियों और कभी ईसाईयों द्वारा मारे जाते रहेंगे और कुछ नहीं कहेंगे? क्या हिन्दुओं को तकलीफ नहीं होती? क्या जब उनकी दुर्गा माता की नंगी तस्वीर बनाई जाती है तो उनका दिल नहीं दुखता? इन सवालों का जवाब क्या है और कौन यह जवाब देगा?

जब भी कभी किसी मुसलमान या ईसाई के साथ अन्याय होता है, सारे मुसलमान, सारे ईसाई और बहुत सारे हिंदू खूब चिल्लाते हैं. हिन्दुओं को गालियाँ देते हैं. उनके संगठनों पर पाबंदी लगाने की बात करते हैं. भारतीय प्रजातंत्र तक को गालियाँ दी जाने लगती हैं. पर जब हिन्दुओं के साथ अन्याय होता है तो यह सब चुप रहते हैं. कश्मीर से पंडित बाहर निकाल दिए गए, कौन बोला इन में से? जम्मू में आतंकवादियों ने कई हिन्दुओं को मार डाला, कौन बोला इन में से? मुझे लगता है कि मुसलमान और ईसाईयों से ऐसी उम्मीद करना सही नहीं है कि वह कभी किसी हिंदू पर अन्याय होने पर दुःख प्रकट करेंगे. शायद उनके धर्म में ही यह नहीं है. पर हिंदू तो हिन्दुओं को गाली देना बंद करें. जब हिंदू हिंदू को गाली देता है तो मुसलमान और ईसाईयों का हौसला बढ़ता है. मुझे यकीन है कि अगर हिंदू हिंदू को गाली देना बंद कर दे तो भारत में धरम के नाम पर दंगे कम हो जायेंगे. हिन्दुओं का एक होना जरूरी है, मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ नहीं, बल्कि मुसलमानों और ईसाईयों को यह बताने के लिए कि भारत में हिन्दुओं के साथ मिल जुल कर रहो. इसी में सबकी भलाई है.

न हिंदू बुरा है,
न मुसलमान बुरा है,
करता है जो नफरत,
वो इंसान बुरा है.

और अब एक निवेदन पोप से:

क्यों परेशां हो?
बदलने को धर्म दूसरों का,
खुदा का कोई धर्म नहीं होता.

Wednesday, August 27, 2008

भारत में इस्लाम खतरे में है???

बहुत पहले एनडीटीवी की एक चर्चा फोरम पर आतंकवाद पर हो रही चर्चा में भाग लेते हुए मैंने कहा था कि बिना स्थानीय मुसलमानों की मदद से यह बम विस्फोट नहीं किए जा सकते। उस समय बहुत से चर्चाकारों ने मुझे गालियाँ दी और आरएसएस का पिट्ठू बताया। आज अखबार में एक ख़बर छपी है, जिसमें मेरी यह बात सच साबित हो रही है. आप भी पढ़िये यह ख़बर:
जो लोग गिरफ्तार हुए हें वह कोई गरीब और पिछड़े हुए मुसलमान नहीं हें। सब शिक्षित हें और दूसरे हिंदुस्तानिओं की तरह सामान्य जिंदगी गुजार रहे हें। यह निर्दोष नागरिकों को मार देने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाते। यह कहते हें कि भारत में इस्लाम खतरे में है। अब तो लग रहा है कि इस्लाम भारत के लिए खतरा बनता जा रहा है।

Monday, August 18, 2008

अब तो अवतरित हो जाओ कन्हैया

तुम्हारा जन्म दिन फ़िर आ रहा है,
इस बार तो अवतरित हो जाओ कन्हैया,
या इस बार भी दिखावों के आयोजनों में ही बीत जायेगा तुम्हारा जन्म दिन?
'जब भी धर्म की हानि होगी मैं आऊंगा', यही कहा था तुमने पिछली बार,
समय आ गया है अपना वादा निभाओ कन्हैया.
अधर्म राज कर रहा है धर्म पर,
धर्म के नाम पर हिंसा हो रही है,
आतंक फैलाने वाले दनदनाते घूम रहे हैं,
राज्य जनता की रक्षा नहीं कर पा रहा,
सत्ता के लालच ने सत्य को निगल लिया है,
कौवे मोती खा रहे हैं, हंस दाना-दुमका चुग रहे हैं,
पाप की काली छाया ने पूरी पृथ्वी को ढक लिया है,
रिश्वत के बिना कोई काम नहीं होता,
ईमानदारी हर कदम पर बेइज्जत हो रही है,
मानवीय संबंधों का बलात्कार हो रहा है,
बेटी बाप के साथ सुरक्षित नहीं है,
भ्रूण हत्या आम हो रही है,
क्या यह सब काफ़ी नहीं है अवतरित होने के लिए?
अब तो अवतरित हो जाओ कन्हैया.

एक बात का ध्यान रखना कन्हैया,
इस बार काम इतना आसन नहीं होगा,
हजारों कंस हैं इस बार तुम्हारे मुकाबले में,
सैकड़ों धृतराष्ट्र बैठे हैं न्याय की गद्दी पर,
लाखों दुर्योधन और शकुनी घात लगा रहे हैं,
इस बार किसी आम आदमी के घर पैदा होना,
यह आम आदमी ही बनेगा तुम्हारी सेना,
सत्ता के पाखंडियों से बच कर रहना,
वरना विदुर की रसोई ठंडी हो जायेगी,
घसीट ले जायेंगे यह तुम्हें दुर्योधन के महल में,
मीडिया नाम का एक नया हथियार है इन के पास,
जो झूट को सच बना देता है और सच को झूट,
न्याय वही देखता, सुनता और कहता है जो यह चाहते हैं,
कहीं ऐसा न हो कि यह तुम्हें ही आतंकवादी साबित कर दें,
यह कलयुग है कन्हैया और तुम्हारा पहला अवतार है कलयुग में,
जरा ध्यान से अवतरित होना कन्हैया.

Friday, August 15, 2008

भारत माता की जय

बोलो भारत माता की जय,
बोलो बार बार जय हिंद.

Monday, August 04, 2008

जलूस में शामिल होना है तो दरवाजे से बाहर आइये

यह बात अक्सर कही जाती है कि भारत के मुसलमानों को हर बात पर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. उनकी देश भक्ति पर शक किया जाता है. उनसे कहा जाता है कि वह अपनी देश भक्ति साबित करें. और भी धर्मों के लोग इस देश में रहते हैं, उन से अपनी देश भक्ति साबित करने के लिए क्यों नहीं कहा जाता? यह बात कुछ हद तक सही है. ऐसा होता है. यह शिकायत भी जायज है. पर ऐसा क्यों होता है? क्यों लोग ऐसा सोचते हैं? क्या इस के बारे में मुसलमानों ने सोचा है, और जो कारण उनकी समझ में आए हैं, क्या उन्हें दूर करने की कोशिश की है?

मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, इसके लिए वह विशेष सुविधाओं की मांग करते हैं. पर जहाँ वह बहुसंख्यक हैं, क्या वह वही सुविधाएं अल्पसंख्यकों को देने को राजी होते हैं? कश्मीर इसका एक उदाहरण है. वहां के मुसलमानों ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने का विरोध किया. क्यों? क्या कारण था इस के पीछे? क्यों हिंदू दर्शनार्थियों को सुविधा देने के लिए कुछ जमीन बोर्ड को नहीं दी जा सकती? इस के बाद मुसलमान कैसे यह शिकायत कर सकते हैं कि उन की देश भक्ति पर संदेह किया जाता है? ऐसे बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं.

मेरे विचार में जब तक मुसलमान ख़ुद को राजनीति की विसात पर गोटी बनाकर पेश करते रहेंगे, नफरत के सौदागर यह गोटियाँ खेलते रहेंगे. इस बार परमाणु करार पर कटघरे में किसने खड़ा किया मुसलामानों को? जरा सोचिये यह वही लोग हैं जिन्हें मुसलमान अपना समझते है. जों मुसलमानों की नज़र में धर्म-निरपेक्ष हैं. आरएसएस को अपना दुश्मन मान कर मुसलमानों ने अपनी कमजोरी बता दी है इन लोगों को. मुसलमान आरएसएस से डरते रहेंगे और यह लोग आरएसएस का नाम लेकर उन्हें डराते रहेंगे. अरे यह डरना डराना बंद कीजिये. खुले दिल से आइये और राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होइए. फ़िर देखिये कौन आप को दुतकारता है और कौन आपको गले लगाता है? दरवाजे के पीछे से आप जलूस को सिर्फ़ देख भर सकते हैं, उसमें शामिल नहीं हो सकते. शामिल होना है तो दरवाजे के बाहर आना होगा.

सब का देश पर बराबर का हक है, बराबर की जिम्मेदारी है. हक़ लेना है तो जिम्मेदारी निभानी होगी. ख़ुद को सब में शामिल करना होगा. अलग बस्तियां बना कर दूसरों से कैसे मिल पायेंगे. और जब अलग रहेंगे तो शक तो पैदा होगा ही.

Friday, August 01, 2008

मौलवियों के फतवे और आतंकवाद में वढ़ोतरी

जब आतंकवाद के ख़िलाफ़ मुस्लिम स्कालर्स ने फतवे जारी किए थे तब यह आशा बंधी थी कि आतंकवादी उनका सम्मान करेंगे और आतंकवादी हमलों में कमी आएगी. पर हुआ उस का उल्टा, आतंकवादी हमले और बढ़ गए.

मुस्लिम स्कॉलर्स के अनुसार आतंक फैलाना और निर्दोष लोगों की हत्या करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है. तब इस्लाम के नाम पर यह खून खराबा क्यों हो रहा है? क्या यह आतंकवादी इस्लाम में यकीन नहीं रखते? अगर ऐसा है तो इन्हें मुस्लिम बिरादरी से निकाला जाना चाहिए. इन के साथ वही होना चाहिए जो इस्लाम का अपमान करने वालों के साथ किया जाता है, जो सलामन रशदी के साथ किया गया, जो तसलीमा नसरीन के साथ किया गया.

या यह फतवे सिर्फ़ दिखाने के लिए जारी किए थे और इन का मकसद आतंकवाद का खात्मा करना नहीं था. कहीं यहाँ पर यह कहावत तो लागू नहीं हो रही - फतवे दिखाने के और, बताने के और.

Friday, July 25, 2008

सड़क दुर्घटना, जन संपत्ति का नुक्सान और हिंसक हिंदू धर्म

मुराद अली बैग एक लेखक हैं. इन्होनें कई किताबें लिखी हैं धर्म पर. आज एक अखबार में उनका एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है 'वायोलेंट रिलीजन' यानी 'हिंसक धर्म'. यह लेख श्रावण मास में कांवरियों द्बारा गंगाजल लाने के बारे में है. लेख में कुछ अच्छी बातें लिखी हैं, पर कुछ ऐसी बातें भी हैं जिन्हें अगर न लिखा जाता तो अच्छा होता.

पहली ग़लत बात तो है इस लेख का शीर्षक.
१) अगर कांवरियों के गंगाजल लेकर घर लौटने से हरिद्वार-दिल्ली मार्ग पर ट्रेफिक अवरुद्ध हो जाता है और प्रशासन इस मार्ग को अन्य यात्रिओं के लिए बंद कर देता है तो हिंदू धर्म को हिंसक धर्म कह देना क्या सही है? यह बात ध्यान रखने की है कि एक अन्य मार्ग से हरिद्वार-दिल्ली के बीच आवागमन चलता रहता है. रास्ते तो मुहर्रम का जलूस निकालने के लिए भी बंद किए जाते हैं. क्या इस से इस्लाम एक हिंसक धर्म हो जाता है?
२) सड़क पर दुर्घटनाएं होती हैं। इन कांवरियों के आने के दौरान भी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। यह दुखद है। इन दुर्घटनाओं से क्रोधित होकर कांवरियों द्बारा जन-संपत्ति को नुकसान पहुंचाना ग़लत है, पर क्या इस के कारण हिंदू धर्म को हिंसक धर्म कह देना सही है? सड़क दुर्घटनाओं से क्रोधित होकर जनता द्बारा जन-संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं. पर इस के लिए कभी किसी को किसी धर्म को हिंसक करार देते नहीं सुना. गाजियाबाद लोनी में एक विवादास्पद स्थल पर जब पुलिस ने एक मस्जिद के गैरकानूनी निर्माण को रोका तो भीड़ ने पुलिस पोस्ट को जला दिया और पुलिस स्टेशन को जलाने का प्रयास किया. क्या मुराद जी इस्लाम को हिंसक धर्म कहेंगे? क्या इस्लामिक जिहाद के नाम पर जब मुसलमान आतंकवादी हमले करके अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं तब मुराद जी इस्लाम को हिंसक धर्म नहीं कहते.

मुराद जी ने कांवरियों द्बारा गंगाजल लाने को एक खोखली प्रथा, धर्मान्धता और अंधविश्वास की संज्ञा दी है. उन्होंने आगे यह कहा है कि इन्हीं ग़लत बातों के कारण कुछ महापुरुष नए धर्मों की नीव डालते हैं. इस सिलसिले में उन्होंने मुहम्मद द्बारा इस्लाम की नीव डालने का हवाला दिया है. अब इस्लाम के नाम पर हो रही मार काट को देखते हुए क्या एक और मुहम्मद की जरूरत मुराद जी को नहीं महसूस होती?

अच्छा होता कि मुराद जी अपने लेख में कुछ संय्म बरतते और कांवरियों से सम्बंधित समस्या को धर्म से न जोड़ते. ऐसे लेख दूसरों के मन को केवल दुःख पहुँचा सकते हैं.

Monday, July 21, 2008

दो तस्वीरें और

मैंने अपनी पिछली पोस्ट में कुछ तस्वीरे पोस्ट की थीं, आरएसएस की शाखा और एक मुसलमान सज्जन द्वारा किए जा रहे प्राणायाम पर। आज फ़िर दो तस्वीरें लाया हूँ आपके लिए। वही मुसलमान सज्जन प्राणायाम कर रहे हें औए पास ही में शाखा हो रही है।

Thursday, July 10, 2008

आरएसएस की शाखा, प्राणायाम और मुसलमान

मैं जिस पार्क में सुबह घूमने जाता हूँ वहां आरएसएस की एक शाखा चलती है. लोग घूमते रहते हैं, कुछ लोग प्राणायाम करते हैं, कुछ लोग सत्संग करते हैं, बच्चे खेलते रहते हैं. मतलब यह कि लोग जिस उद्देश्य से पार्क में जाते हैं उस के अनुसार पार्क में जाने का आनंद उठाते हैं.

आज जब मैं पार्क में पहुँचा तो मैंने देखा कि आरएसएस की शाखा चल रही है, और उसके पास एक मुसलमान सज्जन हरी घास पर चादर विछा कर प्राणायाम कर रहे हैं. किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं है. मैंने चुपके से कुछ फोटों खींच लीं. आप भी देखिये.
अक्सर लोग आरएसएस के बारे मैं यह कहते हैं कि वह मुस्लिम विरोधी है. यहाँ तो मुझे ऐसा कुछ नजर नहीं आया. उन मुस्लिम सज्जन के हाव-भाव से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वह आरएसएस के झंडे के पास प्राणायाम करते हुए कुछ परेशान हैं. दोनोअपना काम करते रहे. पहले मुस्लिम सज्जन ने प्राणायाम पूरा किया, अपनी चादर समेटी और चले गए. उसके बाद आरएसएस की विधि-पूर्वक शाखा पूरी हुई और वह लोग भी चले गए.

Tuesday, July 08, 2008