'प्रेम करो सब से, नफरत न करो किसी से'
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दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो.

Thursday, June 04, 2009

हरिओम

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Sunday, March 01, 2009

कार्यछेत्र में आध्यात्मिकता

यह प्रेसेंटेशन मुझे एक मित्र ने दिया. सोचा आप सबके साथ बांटू.
Spirituality in the Work Place

Thursday, February 26, 2009

सुख और दुःख - दो रिश्तेदार इंसानों के

कभी पढ़ा था - सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू हैं. कल साईं बाबा सीरिअल में बाबा ने कहा - सुख और दुःख इंसानों के दो रिश्तेदार हैं. सुखों से इंसान खुद रिश्तेदारी रखना चाहता है और उसके लिए हर उपाय करता है. दुःख स्वयं ही इंसान के रिश्तेदार बन जाते हैं और उसे रिश्तेदारी निभाने को वाध्य करते हैं. वह इंसान की परछाईं बन जाते हैं. इंसान बहुत प्रयत्न करता है दुखों से छुटकारा पाने को पर दुःख उस का पीछा नहीं छोड़ते. आखिर इन दुखों के लिए इंसान खुद ही तो जिम्मेदार है. उसके पूर्व जन्मों का फल हैं यह सुख और दुःख. 

बाबा ने कहा इंसान को सुख और दुःख दोनों को समान रूप से देखना चाहिए. दोनों उसी के कर्मों का फल हैं, इसलिए एक से प्यार और दूसरे से नफरत उचित नहीं हैं. कर्मों का फल तो भोगना ही होगा, सुख या दुःख. इंसान को चाहिए की ऐसे कर्म न आकर जिस से उसके खाते में दुःख जमा हों. अब तक तो दुःख जमा हो चुके हैं वह तो भुगतने ही पड़ेंगे, पर आगे से इंसान को सावधानी वरतनी चाहिए. 

इंसान को हर समय ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, इस से वह गलत कर्म करने से बचा रहेगा. जब ईश्वर उसके ध्यान में होंगे तो गलत कर्म तो उस से हो ही नहीं सकते. गलत कर्म तो तब होते हैं जब इंसान ईश्वर को भूल जाता है और खुद को अंहकार के बस होकर बहुत बड़ा समझने लगता है. 

बचपन में स्कूल की किताब में पढ़ा था -
दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करें तो दुःख काहे को होय. 

कितनी सीधी और सच्ची बात है, पर इंसान न जाने किस उलट-फेर में लगा रहता है, दुखों को अपना रिश्तेदार बना लेता है और जीवन भर रोता रहता है. 

Sunday, February 01, 2009

जानवर भी एहसान मानते हैं, पर इंसान !!!

मेरे एक सहयोगी ने इ-मेल में एक वीडियो भेजी जिस में एक शेर एक महिला को प्यार कर रहा है. हुआ यह कि इस महिला  को यह शेर जंगल में धायल अवस्था में मिला. महिला ने उसे जानवरों के अस्पताल ले जाकर उस का ईलाज करवाया. कुछ दिन बाद शेर ठीक हो गया. महिला ने उसे चिड़ियाघर  पहुँचा दिया. कुछ दिन बाद महिला उसे देखने चिड़ियाघर गई. चिड़ियाघर  के प्रबंधक उसे शेर के दड्वे के पास ले गए. फ़िर जो हुआ आप इस वीडियो में देखिये.  

video

Thursday, January 15, 2009

साईं बाबा आरती

जय साईं नाथ .............


Monday, January 12, 2009

गणपति आरती

लता जी की मधुर आवाज में गणपति की आरती सुनिए 

Friday, January 09, 2009

मानव शरीर किस लिए है?

शिष्य ने गुरु से पुछा, 'हमें यह मानव शरीर किस लिए मिला है?'
गुरु जी बोले, 'मानव ईशर की उत्कृष्ट रचना है. मानव शरीर पाकर हम ईश्वर को पा सकते हैं, पर उसके लिए हमें इस शरीर का सही उपयोग करना होगा. 
हम इस शरीर से बहुत सारे काम लेते हैं. मस्तिष्क सोचता है, हम हमेशा अच्छा सोचें, हमारे मन में हर समय ईश्वर का ही ध्यान हो. हमारा सोच अहिंसक हो. 
जिव्हा से हम बोलते हैं. हम हमेशा अच्छा बोलें, हमारी जिव्हा पर हर समय ईश्वर का ही नाम हो. हमारे वचन मधुर और अहिंसक हो. 
आंखों से हम देखते हैं.हम हमेशा अच्छा देखें. हमारी आँखें हर प्राणी में ईश्वर का ही दर्शन करें. 
कानों से हम सुनते हैं. हम हमेशा अच्छा सुनें. हमारे कान हर समय ईश्वर का गुणगान सुनें. 
हाथों से हम काम करते हैं. हम हमेशा अच्छे काम करें. हमारे हाथ हमेशा ईश्वर को प्रणाम करने के लिए जुड़े रहें. हमारे हाथों से सब प्राणियों का भला हो. 
पैरों से हम चलते हैं. हमारे पैर हमेशा अच्छे रास्तों पर चलें. हमारे पैर तीर्थ यात्रा पर चलें. दूसरों की सहायता के लिए हमारे पैर हमेशा चलने को तैयार रहें. 
हमारा शरीर हमेशा जन कल्याण और ईश्वर प्राप्ति में लगा रहे. 

Wednesday, January 07, 2009

मालिक का घर अब कितना मालिक का बचा है?

जब भी मैं किसी मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च के सामने से निकलता हूँ, मेरा मन श्रद्धा से गदगद हो जाता है - यह उसका घर है जो हम सबका मालिक है. हाथ अपने-अपने जुड़ जाते हैं इबादत में. मन में एक प्रार्थना जन्म लेती है - सब सुखी हों, स्वस्थ हों, सानंद हों, सब के मन में एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव हो, सहानुभूति हो, मित्रता पूर्वक साथ रहने का संकल्प हो. पर कुछ लोग मालिक के घर को अपवित्र कर देते हैं, उसकी छत के नीचे षड़यंत्र रचते हैं, मालिक के नाम पर अनेतिक धंधे करते हैं. यह नहीं सोचते कि जो भी वह कर रहे हैं उसका फल उन्हें जरूर मिलना है, वह उस से बच नहीं सकते. जब लोग ऐसा करते हैं तो मालिक को बहुत दुःख होता है. वह उन्हें तरह-तरह से आगाह करता है, पर यह लोग नहीं समझते. 

प्रेम से आँखें गीली हो जाती हैं. नफरत से आँखें जलती हैं. पर लोग प्रेम कम और नफरत ज्यादा करते हैं. आँखें होते हुए भी अंधों जैसा व्यवहार करते हैं. मालिक के घर में झाड़ू-पौंछा लगाने का ढोंग करते हैं, और घर जाकर माता-पिता का अपमान करते हैं. कुछ लोग अपने घर में मालिक का घर बनाते हैं, पर कुछ लोग मालिक के घर में अपना घर बना लेते हैं. नाम मालिक का पर उस के घर पर अधिकार अपना जमाते हैं. इस अधिकार के लिए आपस में झगड़ते हैं, मुकदमेबाजी करते हैं. मालिक के नाम पर आए दान से अपना घर चलाते हैं. मालिक के दर्शन पर टिकट लगा देते हैं. जितना बड़ा घर उतना बड़ा टिकट. 

समझ में नहीं आता कि मालिक का घर अब कितना मालिक का बचा है? 

Sunday, January 04, 2009

मन्दिर का धंधा

मैं सुबह जिस पार्क में घूमने जाता हूँ उसके पास एक मन्दिर है. मैं कभी मन्दिर के अन्दर नहीं गया, बाहर से ही भगवान को प्रणाम कर लेता हूँ. पार्क में आए कुछ सज्जन अक्सर मन्दिर के बारे में बात करते हैं. उनकी बातों से लगता है जैसे मन्दिर एक धंधा हो गया है. इस धंधे पर अधिकार पाने के लिए कुछ लोगों के बीच मुकदमा चल रहा है. लेकिन आज कल मन्दिर पर मोहल्ले के गुंडे का अधिकार है. सारे लोग उस से डरते हैं, या यह कहा जाय कि उस के घूंसे से डरते हैं. भूतकाल में उस ने कई लोगों को घूंसे लगा रखे हैं. हो सकता है भविष्य में यह मन्दिर 'घूंसे वाला मन्दिर' कहलाये. 

मन्दिर में धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते हैं, भंडारे होते रहते हैं. इसमें काफ़ी कमाई होती है. दान पात्र में श्रद्धालु स्त्री-पुरूष काफ़ी धन डालते हैं. यह दान पात्र कब खोल लिया जाता है, इस में कितना पैसा मिला और कितना पैसा किस की जेब में जाता है, रहस्य का विषय है? चुपके से लोग यह कहते सुनाई पड़ते हैं कि मन्दिर की काफ़ी कमाई घूँसेबाज की जेब में जाती है. मन्दिर में दुकाने बनी हैं, इनका किराया भी शायद इसी जेब में जाता है. मन्दिर के बगल में एक दो मंजिला इमारत है, जिस में एक काफ़ी बड़ा हाल है, जिसे शादी या अन्य उत्सवों के लिए किराए पर दिया जाता है. इस से भी काफ़ी आमदनी होती है.

मतलब यह कि मन्दिर का धंधा काफी धूम से चल रहा है. वर्तमान मंदी का इस धंधे पर कोई असर नहीं हुआ है. लोग खुले ह्रदय से दान देते हैं. पता नहीं भगवान् को यह सब पता है या नहीं पर उनके नाम पर लोग अच्छा धंधा कर रहे हैं. जैसे डीडीऐ के ड्रा में उन लोगों के नाम से मकान निकल आए जिन्होनें एप्लाई ही नहीं किया था.  

Friday, January 02, 2009

वाँछित और अवांछित

मर्यादा का अतिक्रमण - 
- अधिकार का अतिक्रमण
- व्यवहार का अतिक्रमण
- व्यवस्था का अतिक्रमण

तन, मन, धन -
- तन मध्यम
- मन विशाल
- धन कम 

मस्तक, ह्रदय, चरण - 
- मस्तक वौद्धिकता
- ह्रदय हार्दिकता
- चरण धार्मिकता 

Saturday, December 27, 2008

भिक्षाम देही

साईं बाबा अपने भक्तों के घर जाकर आवाज लगाते थे - भिक्षाम देही. भक्त बाहर आते और जो कुछ घर में होता बाबा के अर्पण करते. बाबा अपनी झोली का मुंह खोल देते, भिक्षा झोली में आ जाती, और साथ ही झोली में आ जाते भक्तों के दुःख और कष्ट. 

एक बार कुछ लोगों के चढाने पर आयकर अधिकारी बाबा कि संपत्ति का लखा-जोखा करने आए. शिकायत थी कि बाबा के पास अगाध धन है पर वह एक पैसा भी आयकर नहीं देते. बाबा आयकर अधिकारी के रहने की जगह पहुँच गए भिक्षा मांगने, पर उस ने कुछ नहीं दिया. कुछ समय पश्चात् आयकर अधिकारी को सत्य का ज्ञान हुआ. बाबा फ़िर आ गए भिक्षा मांगने. इस बार आयकर अधिकारी ने उन्हें भिक्षा दी और भिक्षा के साथ आयकर अधिकारी  का पेट का दर्द भी झोली में आ गया. 

ऐसे थे साईं बाबा. सब का मालिक एक है. 

Thursday, December 25, 2008

मां ............








क्रिसमस की वधाई 

Sunday, December 14, 2008

तुम अपनी पूजा करो

लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार पूजा करते हैं. सब के पूजा करने के अपने अलग तरीके हैं. सबका अपना विश्वास है कि इस तरह पूजा कर के वह अपने भगवान् को पा सकेंगे. 

सब अपनी आस्था के अनुसार पूजा करें, और दूसरों को उनकी आस्था के अनुसार पूजा करने दें. किसी और की पूजा पद्धति से किसी दूसरे को तकलीफ क्यों हो? 

कुछ लोग मूर्ति पूजा करते हैं, कुछ नहीं. जो मूर्ति पूजा करते हैं उन्हें कोई तकलीफ नहीं कि दूसरे पूजा कैसे करते हैं. लेकिन कुछ लोग, जो मूर्ति पूजा नहीं करते, परेशान रहते हैं कि कुछ लोग मूर्ति पूजा क्यों करते हैं. यह लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते, इस में कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन जब यह लोग मूर्ति पूजा का विरोध करने लगते हैं तब समस्या पैदा हो जाती है. मूर्ति पूजा न करने वालों को इस ग़लत बात से बचना चाहिए. 

तुम अपनी पूजा करो, दूसरों को उन की पूजा करने दो. सब का मालिक एक है. 

Wednesday, December 10, 2008

भगवान की प्राप्ति कैसे हो?

अक्सर लोग ऐसा कहते हैं कि भगवान की दया तो सभी पर समान भावः से है, फ़िर सबको भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती? 

इस में कोई संशय नहीं कि भगवान की पूर्ण दया सभी पर समान भाव से है. किंतु जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति अपने घर में गढ़े हुए धन को न जानने के कारण तथा पास में पड़े हुए पारस को न जानने के कारण लाभ नहीं उठा सकता, बैसे ही अज्ञानी लोग भगवान को और भगवान की दया के रहस्य को न जानने से भगवान प्राप्ति का लाभ नहीं उठा सकते. भगवान की दया के रहस्य को समझने से शोक और भय का अत्यन्त अभाव हो जाता है, सदा के लिए परम शान्ति एवं परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है. भीष्म, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि भगवान की दया के रहस्य को जानते थे, इसलिए वह कृतकृत्य हो गए, किन्त अज्ञान के कारण दुर्योधन आदि न हो सके. 

भगवान और भगवान की दया के रहस्य को जानने का सबसे सरल उपाय है - भगवान् की अनन्य शरण हो जाना:
१. भगवान के किए प्रत्येक विधान में प्रसन्नचित्त रहना, 
२. निष्काम प्रेम-भाव से नित्य-निरंतर उस के स्वरुप का चिंतन करते हुए उसके नाम का जप करना एवं उसकी आज्ञा का पालन करना,
३. जो व्यक्ति भगवान के प्रभाव एवं तत्व को जानने वाले हैं तथा जो भगवान् की अनन्य शरण हो चुके हैं, ऐसे प्रेमी भक्तों का संग करके, उनके बतलाये हुए मार्ग के अनुसार चलना.

गीता में भगवान ने स्वयं अर्जुन से कहा है - "हे अर्जुन, जो मनुष्य केवल मेरे लिए, सब कुछ मेरा समझता हुआ, यज्ञ, दान और तप आदि सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है और मेरे परायण है, अर्थात मेरे को परम आश्रय और परमगति मान कर, मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर है तथा मेरा भक्त है अर्थात मेरे नाम, गुण, प्रभाव और रहस्य के श्रवण, कीर्तन, मनन, ध्यान और पठन-पाठन का प्रेम सहित, निष्काम भावः से निरंतर अभ्यास करने वाला है और आसक्ति रहित है अर्थात स्त्री, पुरूष और धन आदि सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थों में स्नेह रहित है और सम्पूर्ण भूत प्राणियों में  वैरभाव से रहित है, ऐसा वह अनन्य भक्ति वाला मनुष्य मेरे को ही प्राप्त होता है." 

Tuesday, December 09, 2008

सब मुस्लिम भाई-बहनों को हेप्पी ईद-उल-जुहा

ईद-उल-जुहा इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है । यह त्यौहार पैगम्बर इब्राहीम द्वारा दिखाई गई बलिदान की भावना का त्यौहार है. यह इंसान के मन में ईश्वर के प्रति विश्वास की भावना को बढ़ाता है. परस्पर प्रेम, सहयोग और ग़रीबों की सेवा करने का आनंद इस त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ है. 

भारत और भारत से बाहर रहने वाले मुस्लिम भाई और बहनों को मेरी और से हेप्पी ईद-उल-जुहा.