'प्रेम करो सब से, नफरत न करो किसी से'
Get your website at top in all search engines
Contact Rajat Gupta at 
9810213037, or
Go to his site

For free advice on management systems - ISO 9001, ISO 14001, OHSAS 18001, ISO 22000, SA 8000 etc.
Contact S. C. Gupta at 9810073862
e-mail to qmsservices@gmail.com

दैनिक प्रार्थना

हमारे मन में सबके प्रति प्रेम, सहानुभूति, मित्रता और शांतिपूर्वक साथ रहने का भाव हो.

Tuesday, October 07, 2008

इंसानियत क्या धर्म देख कर जागती है?

ईशर ने सबको इंसान बना कर पैदा किया. वह किसी इंसान में अन्तर नहीं करता. वह सब से प्रेम करता है. प्रेम उस का एक रूप है. पर हमने उसे बाँट दिया. हमने इंसानों को बाँट दिया. अलग-अलग धर्म बना दिए. हर धर्म का एक ईश्वर तय कर दिया. ठीक है. मैं इस में कोई बुराई नहीं देखता, पर बुरा हुआ तब जब हम धर्म और ईश्वर के नाम पर लड़ने लगे, मेरा ईश्वर सही है, मेरा ईश्वर सब से बड़ा है. यह तो ईश्वर की इच्छा के ख़िलाफ़ बात हुई.

हम इंसान हैं. इंसानियत एक ऐसा जज्बा है जो इंसान को ईश्वर की सब से सुंदर रचना बनाता हैं. पर हम ने इंसानियत को इंसान से दूर कर दिया. हमने इंसानियत को एक गहरी नींद सुला दिया. जो तब जागती है जब हमारे धर्म का कोई व्यक्ति मरता है. दूसरे धर्म का व्यक्ति जब मरता है तब यह सोती रहती है. उन के लिए हमने इस का उल्टा रूप हैवानियत तैयार कर रखा है.

अपने धर्म वालों के लिए इंसानियत और दूसरों के लिए हैवानियत. यह आज कल के इंसान का असली रूप बनता जा रहा है.

10 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

धर्म और ईश्वर क्या दोनों ही मानव निर्मित नहीं हैं? आप का आलेख आज यही कह रहा है।

Udan Tashtari said...

बहुत सही.

seema gupta said...

अपने धर्म वालों के लिए इंसानियत और दूसरों के लिए हैवानियत. यह आज कल के इंसान का असली रूप बनता जा रहा है.
" ek ek shabd sach likha hai bikul sach'

regards

सुमो said...

सही कह रहें है सुरेश जी
कुछ मूढों की तो इन्सानियत ही नहीं शर्म भी केवल धर्म देखकर जागती है
अगर पीड़ित एक धर्म विशेष का हुआ तो वे शर्मा कर जमीन में समा जायेंगे

rakhshanda said...

बिल्कुल सही कहा आपने, यही आजका सच है...इंसान इंसान है, चाहे किसी भी धर्म से उसका ताल्लुक क्यों ना हो...लेकिन होता ये है की अपना एक मरता है तो लोग दूसरों के चार मार देना चाहते हैं....यही हमारा अलमिया है...

डॉ .अनुराग said...

बजा फरमाया .....

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी हमेशा की तरह से एक सच आज फ़िर आप ने अपने लेख मे दिया,क्या बरसात धर्म देख कर होती है, क्या सुरज धर्म देख कर अपनी किरने बाटतां है. क्या हवा, पानी धर्म देख कर मिलता है, उस ऊपर वाले ने जब किसी के साथ भेद भाव नही किया तो हम उस के नाम से क्यो भेद भाव कर रहे है,
धन्यवाद

ज्ञान said...

आजकल इंसान सीमित हैं, सिर्फ प्राणी रह गये हैं

Suresh Chandra Gupta said...

@धर्म और ईश्वर क्या दोनों ही मानव निर्मित नहीं हैं?

धर्म मानव निर्मित है, ईश्वर नहीं. मानव तो स्वयं ही ईश्वर की एक रचना है. मानव ने जब-जब नए धर्म बनाए, ईश्वर को उस की चाहरदीबारी में बंद कर दिया और उस पर अपनी मिलकियत की मुहर लगा दी और घोषणा कर दी - 'यह मेरा ईश्वर है और मेरा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से बड़ा, अच्छा और ज्यादा मेहरबान है'. ईश्वर को एक बस्तु बना दिया. यही सारे झगड़े का कारण है.

मानवीयता मानव का एक गुण है, जो जब उस से अलग हो जाता है तो मानव मानव नहीं रहता. यह मानवीयता धर्म के आधार पर परिभाषित नहीं की जा सकती. लेकिन धर्म की स्वनिर्मित चाहरदीबारी में बंद मानव ने अपनी मानवीयता भी उस चाहरदीबारी में बंद कर ली.

सतीश सक्सेना said...

bahut badhiya likha hai bhai jee !