दैनिक प्रार्थना

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Wednesday, August 27, 2008

भारत में इस्लाम खतरे में है???

बहुत पहले एनडीटीवी की एक चर्चा फोरम पर आतंकवाद पर हो रही चर्चा में भाग लेते हुए मैंने कहा था कि बिना स्थानीय मुसलमानों की मदद से यह बम विस्फोट नहीं किए जा सकते। उस समय बहुत से चर्चाकारों ने मुझे गालियाँ दी और आरएसएस का पिट्ठू बताया। आज अखबार में एक ख़बर छपी है, जिसमें मेरी यह बात सच साबित हो रही है. आप भी पढ़िये यह ख़बर:
जो लोग गिरफ्तार हुए हें वह कोई गरीब और पिछड़े हुए मुसलमान नहीं हें। सब शिक्षित हें और दूसरे हिंदुस्तानिओं की तरह सामान्य जिंदगी गुजार रहे हें। यह निर्दोष नागरिकों को मार देने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाते। यह कहते हें कि भारत में इस्लाम खतरे में है। अब तो लग रहा है कि इस्लाम भारत के लिए खतरा बनता जा रहा है।

15 comments:

Nitish Raj said...

पूरी तरह सहमत पर सबको एक तराजू में नहीं तोलना चाहिए। ये बात तो साफ है कि ये मुल्क सबका है और सब ही इस को बचाएंगे। दो चार लोगों के कारण पूरे धर्म पर तोहमत मत लगाओ। जब बांग्लादेश से घुसपैठिए आते हैं तो पनाह हमारे हिंदू नेता ही देते हैं फिर विस्फोट होते हैं तो सवाल क्यों?

Nitish Raj said...

....पर मेरे उच्च कमेंट से ये कतई नहीं माना जाना चाहिए कि मैं इन आतंकवादियों के पक्ष में हूं पर ये भी नहीं कि देश के बाहर से आए चार लोगों के कारण पूरे देश के मुसलमानों पर सवालिया निशान लग जाए। चार लोग बहक गए ना कि पूरे मुल्क की आवाम।

सत्याजीतप्रकाश said...

हर किसी को आतंकवाद का विरोध करना चाहिए, मुसलमान को भी. लेकिन ईमाम बुखारी जैसे लोग पूछताछ के लिए पकड़े गए लोगों के पक्ष में बयानबाजी करते हैं और उसका समर्थन करते हैं, इससे पुलिस बल पर दबाव पड़ता है और उसकी कार्यशैली बेवजह कठघरे में खड़ी हो जाती हैं. ईमाम आतंकवाद के विऱोध में कितने फतवे निकालते हैं, जितने पुलिस के विरोध में. आखिर भारत न्याय में उन्हें भरोसा क्यों नहीं होता, उस उस समय भी जब सुप्रीमकोर्ट से फांसी का सजा पाया हुआ व्यक्ति भारत सरकार का मेहमान बना हुआ है. बात अफजल की कर रहा हूं.

सतीश सक्सेना said...

यह आप क्या कह रहे हैं कृपया पूरी कौम को बदनाम न करें !यह धर्म की दुहाई देकर, धर्म का अन्धानुकरण करने बाले, फूट डालने की कोशिश कर रहे कुछ व्यक्तियों का कार्य कहें तो बड़ी कृपा होगी !. इसी प्रकार की सोच के कारण आपस में वैमनस्य फैलता है ! यह मत भूलिए की देश विभाजन के समय भी कुछ लोगों ने अपनी मिटटी को नही छोड़ा था! अगर आप उस प्यार का भी सम्मान नही कर सकते तो आप ख़ुद ही कट्टर विचारधारा के समर्थक हैं ! मुसलमान कॉम की बात करें तो यह सदियों से रहते चले आ रहे हैं और सैकड़ों महान देश भक्त दिए हैं, अगर यह देश हमारी बपौती है तो यह मुस्लिम भाइयों की भी उतने बपौती है. और अगर आप मुस्लिम कॉम से निकले चाँद गद्दारों तथा उग्रवादियों की बात कर रहे हैं तो हिन्दुओं ने देश को इनसे कम गुंडे नही दिए हैं !
सवाल खुले दिमाग से सोचने का है , पकिस्तान के प्रति भी हमें अधिक चिंता करने की आवश्यकता नही होना चाहिए न उसमें इतना दम है की वोह कभी भी हमारे लिए चुनौती बन सकेगा ! हमारे इन छोटे भाइयों की बेटियाँ ब्याहीं हैं पकिस्तान में, इसका अर्थ यह कतई नहीं कि पकिस्तान से इन्हें अधिक प्यार है ! आज भी भारतीय मुसलमानों की पकिस्तान में वही इज्ज़त है जो एक हिन्दुस्तानी की होनी चाहिए ! आज भी हर पाकिस्तानी' रिश्तों के बाद भी, हर भारतीय मुसलमान को शक कि नज़र से ही देखता है !
इस ख़याल को भी ध्यान में रखते हुए आप न्याय करें, और अपने इन्हें, देश के बच्चों की निगाह से देखते हुए अपने विचार व्यक्त करें तभी आपकी मानसिकता देश भक्ति की मानी जायेगे अन्यथा हम और आप इस देश का अनिष्ट ही कर पाएंगे !

Anonymous said...

सतीश सक्सेनना जी,

आप केवल दस मुस्लिम स्वतमत्रता संग्राम सेनानियों के नाम बता दीजिये तो जाने, लेकिन हम सैंकड़ों मुस्लिम आतंकवादियों के नाम बता सकते हैं।

अनाम

अशोक पाण्डेय said...

भारत अथवा दुनिया के किसी भी देश को किसी धर्म से खतरा नहीं हो सकता। धर्म हमें अच्‍छाइयों की ओर ले जाता है, बुराइयों की ओर नहीं। खतरा है हमें पाखंडियों से, चाहे वे धर्म के नाम पर पाखंड करनेवाले हों अथवा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर। यही लोग अपने निहित स्‍वार्थ के लिए लोगों को बांट रहे हैं।

COMMON MAN said...

bilkul sahi kah rahe hain gupta ji, jo dharm-nirpekshi hain unki jaroorat arab deshon men jyada hai, isliye nitish aur saxena ji arab deshon men apni muhim kii shuruaat karen, meri shubhkaamnaayen inke saath hain

Anonymous said...

"अनाम जी " कृपया इस किताब
Muslim Freedom Fighters of India/edited by S. Ganjoo.
तथा
http://en.wikipedia.org/wiki/
Freedom_fighters_of_India

का अवलोकन करें.
विषय से भटकें नहीं.

Suresh Chandra Gupta said...

आप सब की टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. जो स्थानीय मुसलमान आतंकवादियों की मदद करते हैं या जो ख़ुद आतंकवादी हमले करते हैं, वह भारत के सारे मुसलामानों का कुछ प्रतिशत हैं, पर यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है, और इस में वह मुसलमान भी शामिल हो रहे हैं जो शिक्षित हैं और अच्छी जिंदगी जी रहे हैं. यह चिंता का विषय है. इसे नकारना भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

शबाना आजमी एक अच्छी कलाकार हैं, सारे भारतीय उनकी इज्जत करते हैं. वह मुंबई में मकान न मिलने पर 'भारतीय प्रजातंत्र भारतीय मुसलमानों के ख़िलाफ़ है', ऐसा कहने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाती. भारत में हिन्दुओं का एक बड़ा प्रतिशत किसी मुसलमान के साथ अन्याय होने पर जितना शोर करता है उतना शोर किसी हिंदू के साथ अन्याय होने पर मुसलमान नहीं करते. कश्मीर में पंडितों के साथ जो हुआ उसका कितना विरोध कितने मुसलमानों ने किया. ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब पाना जरूरी है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

नहीं गुप्ता जी,
जिस भारत के राष्ट्रपति हों जाकिर, फखरुद्दीन और कलाम
उस भारत में खतरे में कैसे हो सकता है मुस्लिम औ इस्लाम?
अपराधी और हत्यारे चाहे किसी भी धर्म के हों समाज से बहिष्कृत हों और कानून के अंतर्गत कड़ी से कड़ी सज़ा पायें
दरअसल पाकिस्तान बनाने की वकालत करने वाले मुसलमान पढ़े-लिखे भी थे और धनी-ज़मींदार भी. अनपढ़ और गरीब आज भी देशभक्त है क्योंकि वह "खतरे में" की आड़ में दूसरों की जान लेने की बात सोच भी नहीं सकता है.

सतीश सक्सेना said...

गुप्ता जी !
मैं अक्सर आपके बेवाक कमेंट्स पढता रहता हूँ, भारतीय समाज के आधार को बचाने के प्रयत्न पर मैं आपका प्रशंसक हूँ और रहूँगा ! मगर अफ़सोस है की ब्लॉग जगत पर स्वप्रतिष्ठित साहित्यकारों की कमी नही है, उसपर तुर्रा यह की इनके ग्रुप्स भी हैं जो एक दूसरे की हिम्मत अफजाई करते हैं ! जो सही में समझदार है वे अक्सर "पचडे" में नही पड़ते ! अच्छे प्रश्न का उत्तर देना अच्छा लगता है, बचकानी चीजों का क्या जवाब दें ! सोचता हूँ आज नहीं तो कल जब इनको अपनी भूल का पता चलेगा ! तब शायद यह अपने आप से माफ़ी मांग सकें !
मेरा आपसे अनुरोध है की जो कष्ट आपका है उसका इलाज़ ढूंढे, और सुझाव दें, आप इतिहास जानते हैं, हर वर्ग की अपने तकलीफें हैं, और बहुमत का दायित्व हमेशा अधिक होना चाहिए ! मगर इस बात से आप सहमत होंगे की एक परिवार में साथ रहने की कुछ आधार भूत शर्तें होती है जिन्हें घर के मुखिया तय करते हैं, सो आप अपना दायित्व निभाएं एवं दिशा निर्देश दें !
आपका ब्लॉग पर हर धर्म को प्रमुखता दी गयी है, काबा और गुरु के चित्रों को देख कर उम्मीद करता हूँ की लोग कुछ सीखेंगे !

Suresh Chandra Gupta said...

स्पष्ट राय के लिए आप का धन्यवाद. अगर कोई समस्या होती है तो उस का समाधान भी होता है. समस्या भले ही कुछ लोगों द्वारा पैदा की गई हो पर अगर वह पूरे समाज को प्रभावित करती है तो उस का समाधान भी सबको मिल कर खोजना होता है. इसके लिए समस्या के मूल कारणों को जानना जरूरी है तभी हम समस्या का निदान कर पायेंगे. कश्मीर की समस्या का बीज बोया गया था ६० वर्ष पहले उस समय के प्रधान मंत्री द्वारा. उस समय अगर समजदारी से काम लिया गया होता तो आज यह समस्या न होती. आज इस समस्या का हल कठिन और ज्यादा कठिन होता जा रहा है. जो नेता इस सम्बन्ध में कुछ कर सकते हैं वह ही कहीं न कहीं इस समस्या के लिए जिम्मेदार नजर आते हैं. समस्या को दूर करने की जगह वह इस समस्या का इस्तेमाल करके अपनी पार्टी के लिए वोट बटोरने में लगे हैं. आम नागरिक भी इस वोट की राजनीति में बंट गया है. जम्मू में आतंकवादियों द्वारा कई लोग मार दिए गए पर किसी भी नेता का सहानुभूति पूर्ण स्वर नहीं सुनाई दिया. हाँ सिमी की बकालत करते बहुत नेता नजर आए. कुछ लोगों ने कहा कि कश्मीर पाकिस्तान को दे दो. कश्मीरी पंडितों की तकलीफ किसी को महसूस नहीं हो रही है. बम विस्फोटों की जांच के दौरान अगर कोई गिरफ्तारी होती है तो 'मुसलामानों पर अत्याचार हो रहा है' ऐसी आवाजें सुनाई देने लगती हैं. समस्या को सुलझाया नहीं, और बिगाड़ा जा रहा है. समस्या के मूल में धर्म का ग़लत मतलब समझना है. अगर कोई अपने धर्म के पति बफादार होने का मतलब दूसरे धर्मों से नफरत करना समझता है तो उसे कौन समझायेगा? जो समझा सकते हैं वही तो नफरत करना सिखा रहे हैं. जो सहन कर लेते हैं उन्हें और सताया जाता है. अन्याय और अत्त्याचार को सही या ग़लत इस आधार पर कहा जाता है कि अन्यायी और अत्त्याचारी किस धर्म का है.


मेरे विचार में एक ही तरीका है, प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. और यह हम सबको ख़ुद ही सीखना होगा.

सतीश सक्सेना said...

वाह बड़े भाई !
"मेरे विचार में एक ही तरीका है, प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से. और यह हम सबको ख़ुद ही सीखना होगा."
मुझे आपके इन शब्दों ने बहुत ताक़त दी है ! मुझे जैसा विश्वास था,आपके बारे में, वही आपने व्यक्त किया ! आपका धन्यवाद !
इस्लाम खतरे में है का नारा लगा कर कुछ मूर्खो तथा इस्लाम के नासमझों की हरकतों ने देश में बहुत जहर घोला है, इनको हमें जवाब देना है की खतरे में इस्लाम नहीं खतरे में ये उग्रवादी और धार्मिक कट्टरता है ! समय के साथ धर्म को अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से परिभाषित करने वाले लोग बेनकाब होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है !
इस्लाम के नाम पर उग्रवाद का पाठ पढाने वालों के लिए हबीब जालिब की यह नज़्म पेश है जो शहरोज के ब्लॉग हमजबान से साभार ली गई है !
link http://hamzabaan.blogspot.com/2008/07/blog-post_23.html

ख़तरे में इस्लाम नहीं

खतरा है ज़र्दारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी ज़मीं को घेरे हुए
हैंआख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेनेवाले
उल्फत से बेगाने क्यों

खतरा है खूंख्वारों को
रंग-बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से
लर्जां है बपा एवानों में
बिक न सकेगें हसरतो-अरमाँ
ऊँची सजी दुकानों में

खतरा है बटमारों को
मगरिब के बाज़ारों को
चोरों को,मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अमन का परचम लेकर उट्ठो
हर इंसान से प्यार करो
अपना तो मन्शूर है जालिब
सारे जहाँ से प्यार करो

खतरा है दरबारों को
शाहों के गम्ख्वारों को
नव्वाबों,गद्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
( आभार सहित Hamzabaan से )

(शबाब=जवानी, ईदे-कुर्बां=कुर्बानी का दिन , सवाब=पुन्य ,ज़र्दारों=पूंजीपतियों,नबी=पैगम्बर मोहम्मद,एवानों=संसद,मगरिब=पश्चिम,मन्शूर=घोषणा-पत्रगम्ख्वारों=हमदर्दों)

Suresh Chandra Gupta said...

धन्यवाद सतीश जी,

आप ने यह रचना हम सब के साथ बाँट कर हमें अनुग्रहीत किया है.. कितनी सही बात कही इसमें लेखक ने. वास्तव में इस्लाम खतरे में नहीं है. खतरे में हैं नफरत के सौदागर जो इस्लाम के नाम पर मार काट करते हैं.

सतीश सक्सेना said...

आप जैसे बड़े दिलवाले भाई को प्रणाम ! पहले मैं आपके बारे में ग़लत (एक विशिष्ट सोच रखने वाले पारंपरिक बुजुर्ग) सोचता था , क्षमाप्रार्थी हूँ !
अब इस देश में १९४७ कभी नही आ सकता, हर हालत में हमें सबको साथ लेकर चलना है, तो फिर हमें बदलना होगा, चाहे कौम कोई क्यों न हो !