सारे धर्म प्रेम का संदश देते हैं. हर धर्म कहता है, प्यार से मिल जुल कर रहो. मगर न जाने क्यों, लोग धर्म में अलगाव ढूँढ लेते हैं? अपने-अपने खोलों में बंद हो जाते हैं. एक दूसरे से नफरत करने लगते हैं. दूसरों की हर बात में उन्हें केवल बुराई ही नजर आने लगती है. दूसरों की जान लेना अपनी जिंदगी का मकसद बना लेते हैं.
कैसा होगा वह आदमी जो रेल प्लेट्फार्म पर, होटल में खाना खाते इंसानों पर, बाजार में गोलियों की बोछार कर देता है? बच्चों और औरतों पर भी जिसे रहम नहीं आता. कितनी नफरत भरी होगी उस के दिल में, और वह भी उन लोगों के लिए, जिन्हें वह जानता नहीं, जानना क्या पहचानता तक नहीं. जो यह भी नहीं जानता कि उस की गोली से कौन मरा. किस के लिए कर रहा है वह यह सब - अपने लिए, किसी दूसरे के लिए?
क्या मिलेगा उसे यह सब करके? जन्नत में जायेगा? हूरें मिलेंगी? अरे बेबकूफों, जो यहाँ मिला है उसे छोड़कर उस के लिए मार और मर रहे हो जिसका कुछ भरोसा नहीं कि मिलेगा भी या नहीं.